बिलासपुर : ना कारोबार, ना पात्रता… फिर भी बांट दिए 5 करोड़! BOB की राजकिशोर नगर शाखा में फर्जीवाड़े का पर्दाफाश…

- 11 ऋण खाते एक ही साल में हुए NPA, तत्कालीन शाखा प्रबंधक और माइक्रो फाइनेंस संचालक के खिलाफ चालान पेश।…
बिलासपुर। बैंकिंग व्यवस्था को ताक पर रखकर फर्जी फर्मों के नाम पर करोड़ों रुपये का कर्ज बांटने के सनसनीखेज मामले में आखिरकार EOW-ACB ने छह साल की लंबी विवेचना के बाद न्यायालय में चालान पेश कर दिया है। बैंक ऑफ बड़ौदा की राजकिशोर नगर शाखा में 11 कथित फर्जी फर्मों के नाम पर 5 करोड़ 4 लाख 15 हजार रुपये के ऋण स्वीकृत किए गए। जांच एजेंसी ने इस पूरे मामले में तत्कालीन वरिष्ठ शाखा प्रबंधक राहुल कुमार सिन्हा और विश्वजीत भौमिक को आरोपी बनाया है। 30 अक्टूबर 2026 को विशेष न्यायालय (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम), बिलासपुर में चालान प्रस्तुत किया गया।
जांच में सामने आए तथ्यों ने बैंक की ऋण स्वीकृति प्रक्रिया, दस्तावेजों के सत्यापन और शाखा स्तर पर की गई निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि कागजों पर कारोबार खड़ा किया गया, फर्जी दस्तावेजों के सहारे करोड़ों का ऋण हासिल किया गया और रकम को कथित तौर पर असली कारोबार से दूर दूसरे खातों के जरिए निकाल लिया गया।
2019 में ही डूब गए थे सभी 11 ऋण खाते – मामले की शुरुआत बैंक ऑफ बड़ौदा के क्षेत्रीय कार्यालय, रायपुर की शिकायत से हुई थी। शिकायत के आधार पर ACB-EOW ने 28 जनवरी 2020 को अपराध दर्ज कर जांच शुरू की। करीब छह साल तक चली विवेचना के बाद अब एजेंसी ने आरोपियों के खिलाफ न्यायालय में चालान पेश किया है।
जांच के मुताबिक, 20 मार्च 2018 से 3 मई 2019 के बीच तत्कालीन वरिष्ठ शाखा प्रबंधक राहुल कुमार सिन्हा ने बैंकिंग नियमों और निर्धारित प्रक्रियाओं की कथित अनदेखी करते हुए 11 अपात्र फर्मों को कैश क्रेडिट, ओवरड्राफ्ट, बैंक गारंटी और टर्म लोन जैसी वित्तीय सुविधाएं स्वीकृत की थीं।
हैरानी की बात यह है कि इन सभी 11 ऋण खातों को वर्ष 2019 में ही गैर निष्पादित परिसंपत्ति (NPA) घोषित कर दिया गया। ऋण की राशि वापस नहीं आने से बैंक को 5 करोड़ 4 लाख 15 हजार रुपये की आर्थिक क्षति हुई।
आम लोगों के दस्तावेजों से खड़ी कर दी गईं फर्जी कंपनियां! – EOW-ACB की जांच में कथित फर्जीवाड़े का एक चौंकाने वाला तरीका सामने आया। जांच एजेंसी के अनुसार, विश्वजीत भौमिक जरहाभाठा स्थित उड़ान माइक्रो फाइनेंस के कार्यालय से लोगों को छोटे ऋण और बैंक लोन दिलाने का काम करता था।
इसी प्रक्रिया में वह लोगों से आधार कार्ड, पैन कार्ड, KYC दस्तावेज और संपत्ति के मूल कागजात हासिल करता था। आरोप है कि वह लोगों से बैंक के प्रपत्रों और कोरे चेकों पर भी हस्ताक्षर करवा लेता था।
जांच में आरोप सामने आया कि इन्हीं दस्तावेजों का कथित दुरुपयोग कर संबंधित लोगों की जानकारी और सहमति के बिना उनके नाम पर फर्में गठित कर दी गईं। कुछ फर्मों में अपने ही कर्मचारियों को प्रोप्राइटर यानी मालिक के रूप में दर्शाया गया।
जांच एजेंसी को तीन फर्मों के दुकान एवं स्थापना पंजीयन प्रमाणपत्र भी फर्जी मिले। वहीं, सात फर्मों के GST रिटर्न उड़ान माइक्रो फाइनेंस के कार्यालय से दाखिल किए जाने के तथ्य सामने आए। यानी कागजों पर कारोबार का ऐसा ढांचा तैयार किया गया, जिसकी वास्तविकता जांच में संदिग्ध पाई गई।
फर्मों के पते पर नहीं मिला कारोबार, फिर भी मिलते रहे करोड़ों के लोन! – इस पूरे मामले में बैंक की ऋण स्वीकृति प्रक्रिया भी जांच के दायरे में आई है। EOW-ACB के अनुसार, राहुल कुमार सिन्हा ने ऋण स्वीकृत करने से पहले फर्मों के कारोबार और उनके व्यावसायिक पतों को लेकर निरीक्षण रिपोर्ट में कथित तौर पर गलत जानकारियां दर्ज की थीं।
जांच में यह भी सामने आया कि कुछ मामलों में ऋण लेने वाली फर्मों से असंबंधित व्यक्तियों की संपत्तियों को उनकी जानकारी के बिना ही बंधक के रूप में स्वीकार कर लिया गया।
जब संबंधित फर्मों के पते पर जाकर जांच की गई तो वहां कोई वास्तविक व्यावसायिक इकाई नहीं मिली। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिन फर्मों का मौके पर कारोबार तक नहीं था, उनके नाम पर करोड़ों रुपये के ऋण स्वीकृत कैसे हो गए?
बैंक से निकली रकम पहुंची भौमिक की फर्म तक – – EOW-ACB की विवेचना में ऋण की रकम के कथित अंतिम उपयोग को लेकर भी अहम खुलासा हुआ है। जांच एजेंसी के मुताबिक, बैंक से स्वीकृत ऋण राशि का इस्तेमाल संबंधित फर्मों के वास्तविक कारोबार में नहीं किया गया। इसके बजाय रकम को अलग-अलग बैंक खातों में स्थानांतरित कर निकाला गया।
जांच में विश्वजीत भौमिक को इस रकम का अंतिम लाभार्थी पाया गया। एजेंसी के अनुसार, बैंक से प्राप्त ऋण राशि राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम (NSIC) के माध्यम से भौमिक की अपनी फर्म ए.बी. फास्टनर्स तक पहुंचाई गई।
इतना ही नहीं, जांच में कूटरचित बिलों के आधार पर NSIC, रायपुर से भी भुगतान प्राप्त किए जाने के तथ्य सामने आए हैं। इस तरह बैंक ऋण से लेकर कथित फर्जी बिलिंग तक, पूरे वित्तीय लेनदेन की कड़ियां जांच में सामने आई हैं।
दोनों आरोपियों के खिलाफ गंभीर धाराओं में चालान – EOW-ACB ने विश्वजीत भौमिक और तत्कालीन वरिष्ठ शाखा प्रबंधक राहुल कुमार सिन्हा के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 467, 468, 471 और 120-बी के तहत चालान पेश किया है। इसके साथ ही भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 12 और 13(2) भी लगाई गई हैं।
गौरतलब है कि राहुल कुमार सिन्हा वर्तमान में बैंक ऑफ बड़ौदा की गढ़सीसा शाखा, जिला कच्छ (गुजरात) में वरिष्ठ प्रबंधक के पद पर पदस्थ हैं।
छह साल की जांच के बाद अब न्यायालय में मामला – 11 फर्में, करोड़ों का कर्ज, फर्जी दस्तावेज, संदिग्ध निरीक्षण रिपोर्ट, बंधक संपत्तियों में कथित गड़बड़ी और ऋण राशि का दूसरी फर्म तक पहुंचना – इस पूरे मामले ने बैंकिंग व्यवस्था की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
फिलहाल EOW-ACB ने अपनी विवेचना पूरी कर चालान न्यायालय में पेश कर दिया है। अब मामले में आरोपों की न्यायिक जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया के जरिए यह तय होगा कि इस कथित बैंक ऋण घोटाले में किसकी क्या भूमिका थी और जिम्मेदारी किसकी बनती है।




