जमीन पर कब्जा, नियमों की धज्जियां और प्रशासनिक खामोशी: छातामुड़ा-बांजीपाली बॉर्डर पर करोड़ों की जमीन और शासकीय मद पर रसूखदारों की गहरी नजर…

रायगढ़। न्याय की आस में तहसील कार्यालय की चौखट पर बैठे पीड़ितों की यह दास्तान एक बार फिर यह साबित करने के लिए काफी है कि रसूख और धनबल के सामने कानून के कायदे कितने लाचार नजर आते हैं। मामला रायगढ़ के छातामुड़ा-बांजीपाली हल्का बॉर्डर का है, जहां नेशनल हाईवे से सटी करोड़ों रुपए की बेशकीमती निजी और शासकीय भूमि पर अवैध कब्जे की खुली साजिश रची जा रही है। हैरानी की बात यह है कि पूरा मामला फिलहाल तहसीलदार न्यायालय में विचाराधीन है और अगली सुनवाई 11 नवंबर 2026 को तय है, इसके बावजूद न्याय के अंतिम फैसले का इंतजार किए बिना ही मौके पर बाहुबल के दम पर बाउंड्रीवॉल तानकर कब्जा जमाने का खेल धड़ल्ले से जारी है।

अदालत में न्याय की गुहार, और मैदान पर दबंगई से दीवार! – तहसील परिसर में मीडिया के सामने खुलकर अपनी पीड़ा रखते हुए फत्तेचंद पटेल (गोटिया) और कैलाश आचार्य ने राजस्व अमले की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक सुस्ती पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
पीड़ितों के मुताबिक, विपक्षी नितेश अग्रवाल द्वारा जमीन पर कब्जा न मिलने का हवाला देकर तहसीलदार न्यायालय में परिवाद दायर किया गया था, जिसके बाद फत्तेचंद पटेल और कैलाश आचार्य को नोटिस जारी हुआ। कानूनन जब कोई मामला न्यायालय में विचाराधीन होता है, तो दोनों पक्षों को ‘यथास्थिति’ (Status Quo) बनाए रखनी होती है। लेकिन यहाँ कायदों को ताक पर रखकर रातों-रात निर्माण कार्य शुरू कर दिया गया।
फत्तेचंद पटेल का सीधा आरोप है :
- राजनीतिक सरपरस्ती और गुंडागर्दी : राजनीतिक रसूखदारों के इशारे पर आपराधिक पृष्ठभूमि के तत्वों द्वारा जबरदस्ती उनकी दुकान और गुमटी पर जेसीबी चलाकर तोड़फोड़ की गई।
- मौखिक निर्देश पर रोक : तहसीलदार के समक्ष लिखित शिकायत करने के बाद उन्होंने फोन पर तत्काल निर्माण कार्य रोकने के निर्देश जरूर दिए, लेकिन अब तक लिखित में ‘यथास्थिति’ या स्थगन का आदेश जारी न होने के कारण पीड़ितों में इस बात का भारी खौफ है कि रसूखदार कभी भी आधी रात को फिर से निर्माण कार्य शुरू कर सकते हैं।
सीमांकन या प्रशासनिक प्रपंच? एक खसरा, दो तहसील और दो हल्के! – इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा और चौंकाने वाला तकनीकी पहलू वह सीमांकन है, जिस पर खुद राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े होते हैं।
कैलाश आचार्य ने सनसनीखेज खुलासा करते हुए बताया कि क्या कभी ऐसा हो सकता है कि एक ही खसरा नंबर दो अलग-अलग तहसीलों और दो अलग-अलग राजस्व हल्कों में बँटा हो? इस मामले में खसरा नंबर 155/2 के सीमांकन के दौरान हाईवे से जुड़ी इस जमीन का आधा हिस्सा छातामुड़ा और आधा हिस्सा बांजीपाली में होना पाया गया है, जबकि इसके ठीक बाजू में स्थित खसरा नंबर 155/1/ख की विवादित भूमि का प्रकरण न्यायालय में लंबित है।
- बरसात के दिनों में फर्जी नपाई : पूर्व में जिस सीमांकन का हवाला दिया जा रहा है, वह पूरी तरह एकतरफा और हास्यास्पद था। जिस समय नाप-जोख की गई, उस वक्त चारों तरफ भारी बरसात, कीचड़, झाड़ियां और गहरे गड्ढों में पानी भरा हुआ था। ऐसी विषम परिस्थितियों में वैज्ञानिक और पारदर्शी नपाई असंभव थी।
- आपत्तियों को किया गया दरकिनार : इस गंभीर खामी को लेकर उसी वक्त पंचनामे पर आपत्ति दर्ज कराई गई थी और न्यायालय में भी लिखित आवेदन देकर शुष्क मौसम में निष्पक्ष नाप की माँग की गई थी। लेकिन उन्हें अनसुना कर दिया गया। हद तो तब हो गई जब नकल शाखा में प्रकरण से जुड़े दस्तावेज तक गायब मिले, जो किसी गहरी मिलीभगत की तरफ इशारा करता है।
नेशनल हाईवे से सटी बेशकीमती शासकीय भूमि को निगलने की चाल – विवादित स्थल नेशनल हाईवे से बिल्कुल सटा हुआ है, जहाँ खसरा नंबर 156 की बहुमूल्य भूमि शासकीय मद में दर्ज है।
आरोप है कि इस पूरे सीमा विवाद और तकनीकी गोलमाल का बवंडर इसलिए खड़ा किया जा रहा है ताकि केवल किसान की पैतृक और निजी भूमि ही नहीं, बल्कि सड़क से लगी करोड़ों की बेशकीमती सरकारी जमीन को भी सुनियोजित तरीके से बाउंड्रीवॉल के भीतर समेटा जा सके। यदि समय रहते इस हाई-प्रोफाइल भू-माफियागिरी की उच्चस्तरीय जाँच नहीं हुई, तो शासन को भारी-भरकम राजस्व और बेशकीमती जमीन से हाथ धोना पड़ेगा।
पीड़ितों की दो-टूक मांग : इस पूरे प्रकरण पर अब पीड़ित पक्ष ने जिला प्रशासन और वरिष्ठ अधिकारियों के सामने सख्त मांगें रखी हैं:
- संयुक्त सीमांकन दल का गठन : छातामुड़ा और बांजीपाली दोनों हल्कों के सक्षम अधिकारियों, तहसीलदारों, राजस्व निरीक्षकों (RI) और हल्का पटवारियों की एक संयुक्त टीम बनाई जाए, जो शुष्क मौसम में वैज्ञानिक तरीके से निष्पक्ष सीमांकन करे।
- लिखित स्थगन आदेश : जब तक न्यायालय का अंतिम फैसला नहीं आ जाता, तब तक मौके पर निर्माण कार्य रोकने का सख्त लिखित स्थगन आदेश जारी किया जाए।
न्यायालय की चौखट पर न्याय की आस लगाए बैठे इन किसानों का भविष्य अब इस बात पर टिका है कि जिला प्रशासन पूंजीपतियों के रसूख के आगे झुकता है या फिर कानून का राज स्थापित कर शासकीय संपत्ति और किसान के अधिकारों की रक्षा करता है। मामले की अगली पेशी 11 नवंबर 2026 को मुकर्रर है, तब तक निगाहें प्रशासनिक कदमों पर टिकी हुई हैं।




