सुशासन का ढोल या रसूखदारों के आगे नतमस्तक खाकी?…

- अदालत का ‘लाल वारंट’ जेब में और आरोपी घर में ले रहा चाय की चुस्की; छोटे वारंटियों पर ‘सिंघम’ बनी जशपुर पुलिस ‘गुप्ता कुनबे’ के आगे क्यों बनी भीगी बिल्ली?…
विशेष खोजी रिपोर्ट | जशपुर
कानून की देवी की आँखों पर बंधी पट्टी इंसाफ के तराजू को बराबर रखने के लिए थी, लेकिन जशपुर में पुलिस ने इस पट्टी का इस्तेमाल अपनी सुविधानुसार ‘सिलेक्टिव अंधापन’ साधने के लिए कर लिया है। शहर में इन दिनों गली-कूचों से छोटे-मोटे वारंटियों को दबोचकर अपनी पीठ थपथपाने वाली जशपुर पुलिस की बहादुरी का गुब्बारा उस वक्त फूट गया, जब बात सत्ता के गलियारों में रसूख रखने वाले एक तथाकथित बाहुबली परिवार पर आई।
पड़ोसी राज्य झारखंड की अदालत से गिरफ्तारी का गैर-जमानती वारंट जारी हुए हफ्ता बीत चुका है, वारंट जशपुर पुलिस कप्तान लाल उमेश सिंह के टेबल पर धूल फांक रहा है, लेकिन मजाल क्या कि खाकी की गाड़ी आरोपी के दरवाजे तक पहुँच जाए! आरोपी खुलेआम शहर में घूम रहा है और पुलिस ‘तलाश जारी है’ का घिसा-पिटा प्रशासनिक प्रहसन खेल रही है।
नाम बड़ा, दर्शन खोटे: झारखंड कोर्ट का वारंट और पुलिस की ‘रहस्यमयी लाचारी’ – मामला खुद को इलाके का राजनीतिक आका समझने वाले भाजपा नेता श्याम नारायण गुप्ता के पार्षद पुत्र रोशन गुप्ता का है। मैडम (पत्नी) द्वारा दर्ज कराई गई प्रताड़ना की शिकायत पर जब झारखंड की अदालत ने गिरफ्तारी का लाल वारंट सीधे जशपुर पुलिस कप्तान के नाम थमाया, तो उम्मीद थी कि ‘सुशासन’ का डंडा चलेगा।
हकीकत यह निकली कि वारंटियों पर सर्जिकल स्ट्राइक करने वाले पुलिसिया तेवर पार्षद पुत्र के बंगले की चौखट आते-आते घुटनों पर आ गए। गिरफ्तारी तो दूर, पुलिस ऐसे आंखें मूंदे बैठी है मानो वारंट किसी अपराधी का नहीं, बल्कि रद्दी की टोकरी का कोई पर्चा हो।
बाप ‘नंबरी’ तो बेटा ‘दस नंबरी’? फाइलों में दफन काले कारनामों का कच्चा-चिट्ठा – कहावत है कि पूत के पाँव पालने में दिख जाते हैं, लेकिन यहाँ तो पूरे कुनबे की कारगुजारियों से पुलिस की फाइलें कराह रही हैं। सत्ता की हनक और पैसों की चमक के पीछे जो चेहरे छुपे हैं, उन पर लगे आरोपों की फेहरिस्त किसी भी सभ्य समाज को हिलाने के लिए काफी है:
- ₹52 लाख का जमीन घोटाला: गरीबों, आदिवासियों और सरगुजा अंचल की पावन धरा को छलने का सुनियोजित सिंडिकेट।
- नौकरी के नाम पर ₹2 लाख की ठगी: पीड़िता मिनी माहेश्वरी न्याय की उम्मीद में बीते 8 महीने से एसडीओपी दुर्वेश जायसवाल की चौखट घिस रही है। आवेदन पर धूल की मोटी परत जम चुकी है, लेकिन साहब की ‘जांच’ खत्म होने का नाम नहीं ले रही।
- दहेज प्रताड़ना की कालिख: जिस घर की दहलीज से अपनी ही बहू प्रताड़ित होकर इंसाफ की गुहार लगाने अदालत तक पहुँच जाए, वहां नैतिकता और संस्कारों की बातें सिर्फ ढकोसला साबित होती हैं।
- आदिवासी नाबालिग से दरिंदगी का संगीन आरोप: जल, जंगल और जमीन के मूल बाशिंदों के साथ ऐसा घिनौना अपराध, जो सत्ता संरक्षण के बिना मुमकिन ही नहीं था।
गरीबों पर ‘गुंडा एक्ट’, बाहुबलियों को ‘रेड कारपेट’ – जशपुर पुलिस का दोहरा चरित्र अब खुलकर सड़क पर आ चुका है। अगर किसी गरीब, बेबस या कमजोर तबके के व्यक्ति पर कोई मामूली धारा भी लग जाए, तो पुलिस उसकी तीन पीढ़ियों का रिकॉर्ड खंगालकर उस पर ‘गुंडा एक्ट’ तामील कर देती है और मीडिया में तस्वीरें जारी कर अपनी बहादुरी का ढिंढोरा पीटती है।
लेकिन जब अपराध की संगीन धाराओं से लदे श्याम नारायण गुप्ता और उनके परिवार की बारी आती है, तो पुलिस का सारा पराक्रम सत्ता की चौखट पर नतमस्तक हो जाता है। क्या जशपुर में कानून की धाराएं आरोपी की जेब और उसकी पार्टी का झंडा देखकर तय होती हैं?
कटघरे में जशपुर प्रशासन: सीधे और तीखे सवाल
- एसपी लाल उमेश सिंह जी: क्या झारखंड की सक्षम अदालत द्वारा जारी गिरफ्तारी वारंट जशपुर पुलिस के लिए केवल एक रद्दी का टुकड़ा है, या फिर राजनीतिक दबाव में आपकी टीम के हाथ बंधे हैं?
- एसडीओपी दुर्वेश जायसवाल जी: नौकरी के नाम पर ठगी की शिकार मिनी माहेश्वरी के आवेदन पर 8 महीने से कौन सा गुप्त अनुसंधान चल रहा है? क्या आरोपी का रसूख आपकी कलम से ज्यादा ताकतवर है?
- क्या सुशासन सिर्फ भाषणों के लिए है: गरीबों पर डंडा और सत्ताधारी नेताओं के बेटों को वीआईपी ट्रीटमेंट—क्या यही छत्तीसगढ़ में कानून के राज की नई परिभाषा है?
जब रक्षक ही रसूखदारों के पैरोकार बन जाएं, तो आम आदमी की उम्मीदों का टूटना तय है। जशपुर की जनता सब देख रही है और खाकी की इस चुप्पी का हिसाब वक्त आने पर जरूर मांगेगी। अब देखना यह है कि इस खुलासे के बाद जिले का पुलिस महकमा अपनी रीढ़ की हड्डी तलाश पाता है या फिर ‘गुप्ताजी’ के दरबार में ऐसे ही सलाम ठोकता रहेगा!




