बिलासपुर सीपत कांड में सिस्टम का दोहरा चरित्र : बंधक बनाकर तालिबानी पिटाई और वसूली के बीच ‘लड़की’ व ‘रंगदारी’ में उलझी पुलिस; सिम्स की लापरवाही और पुलिसिया थ्योरी से गहराया रहस्य!…

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)। न्यायधानी बिलासपुर में कानून का खौफ किस कदर खत्म हो चुका है और सरकारी तंत्र किस तरह संवेदनहीनता की चादर ओढ़े बैठा है, सीपत थाना क्षेत्र का ताजा घटनाक्रम इसका जीता-जागता सबूत है। सड़क किनारे रुके दो युवकों-गणेश चंद्राकर और उसके 17 वर्षीय नाबालिग भांजे दुखभंजन कश्यप को 10-15 असामाजिक तत्वों ने बंधक बनाकर बेरहमी से पीटा, मरघटिया (श्मशान) ले जाकर जान से मारने की धमकी दी और ऑनलाइन स्कैनर के जरिए रंगदारी वसूली।
इस रूह कंपा देने वाली वारदात के बाद जहां सिम्स (CIMS) अस्पताल प्रबंधन ने गंभीर रूप से घायल नाबालिग को महज दो दिन में जबरन डिस्चार्ज थमा दिया, वहीं पुलिस अब इस गंभीर अपहरण, लूट और हमले को ‘लड़कीबाजी’ और ‘आपसी विवाद’ के फेर में उलझाकर कमजोर करने की कोशिश में जुटी नजर आ रही है। मीडिया और पुलिस के बीच हुई बातचीत के सामने आए ऑडियो ने पूरे प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
खौफनाक वारदात : सुनसान सड़क से अपहरण, मरघटिया में यातनाएं और ऑनलाइन रंगदारी- पीड़ित गणेश चंद्राकर के बयानों के मुताबिक, घटना की रात दोनों मामा-भांजे जब लौट रहे थे, तभी उन्होंने सड़क किनारे बाइक रोकी। इसी दौरान 10 से 15 उपद्रवियों ने उन्हें घेर लिया और बाइक की चाबी छीन ली। बदमाशों ने शराब के लिए 15 से 20 हजार रुपये की मांग शुरू कर दी। पैसे न होने पर दोनों को जबरन खींचकर खेतों और मरघटिया की तरफ ले जाया गया, जहां कार सवार एक अन्य रसूखदार के साथ मिलकर उन्हें घंटों लाठी-डंडों से पीटा गया।
बदमाशों ने मोबाइल फोन छीनकर पीड़ितों के जीजा से ऑनलाइन स्कैनर मंगवाकर 2,000 रुपये ट्रांसफर करवाए और जेब में रखा कैश भी लूट लिया। इसके बाद पुलिसिया कार्रवाई से बचने के लिए पीड़ितों से जबरन झूठे कबूलनामे का वीडियो बनवाया गया और थाने जाने पर जान से मारने की धमकी देकर छोड़ा गया।
ऑडियो से खुलासा : ‘इतवार’ की सुस्ती के बाद अब केस को भटकाने की कवायद? – वारदात के बाद जब परिजन सीपत थाने पहुंचे, तो खाकी का गैर-जिम्मेदाराना रवैया सामने आया। परिजनों का सीधा आरोप है कि ड्यूटी पर मौजूद पुलिसकर्मियों ने यह कहकर टरका दिया कि “आज इतवार है, स्टाफ कम है, कल देखेंगे।”
वहीं, पुलिस और मीडिया के बीच हुई बातचीत के ऑडियो से यह स्पष्ट हुआ है कि:
- एफआईआर में 3 नामजद आरोपी : पुलिस का दावा है कि पीड़ितों की सुबह दी गई तहरीर के आधार पर 3 आरोपियों के खिलाफ नामजद एफआईआर दर्ज की गई है और वसूली की धाराएं भी शामिल की गई हैं।
- आरोपी फरार, पुलिस की धीमी चाल : घटना के इतने घंटे बीत जाने के बावजूद नामजद आरोपी पुलिस की गिरफ्त से बाहर हैं। पुलिस का कहना है कि आरोपी गांव छोड़कर भाग गए हैं और उन्हें रात में पकड़ा जाएगा।
- ‘लड़की’ के एंगल पर पेच : मामले को संगीन डकैती व अपहरण के बजाय ‘लड़की के चक्कर में विवाद’ का रूप देने की कोशिशों पर सवाल उठ रहे हैं। जब मीडिया ने पुलिस से पूछा कि अगर मामला लड़की से जुड़ा था तो एफआईआर में उसका ठोस उल्लेख और बयान क्यों नहीं है, तो पुलिस इसे शुरुआती सूचना बताकर पल्ला झाड़ती रही। वहीं परिजनों का कहना है कि बदमाशों ने जबरन मारपीट कर लड़की का नाम कबूलवाने का दबाव बनाया था ताकि वसूली पर पर्दा डाला जा सके।
सिम्स (CIMS) का अमानवीय चेहरा: सिर में खून जमा, कान फटा, फिर भी थमा दिया डिस्चार्ज! – पुलिस की हीलाहवाली के बीच स्वास्थ्य महकमे ने भी संवेदनहीनता की हद पार कर दी। 27 तारीख की शाम 17 वर्षीय दुखभंजन को सिम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया था। किशोर के सिर में ब्लड क्लॉट (खून का थक्का) था, कान का पर्दा फटने जैसी गंभीर चोटें थीं और पीठ पर लाठियों के गहरे काले निशान थे।
इसके बावजूद, डॉक्टरों ने पीठ के घावों पर मलहम तक लगाने की सुध नहीं ली और महज 48 घंटे के भीतर (29 तारीख को) कागजों पर ‘सॉफ्ट टिश्यू इंजरी’ (मामूली चोट) लिखकर उसे जबरन डिस्चार्ज कर दिया। पिता अस्पताल के बाहर गिड़गिड़ाते रहे कि बेटा दर्द से तड़प रहा है, लेकिन डॉक्टरों ने हाथ में पर्चा थमाकर चलता कर दिया।
सिस्टम की चौखट पर दम तोड़ता इंसाफ: ये 5 सवाल मांग रहे हैं जवाब
- सड़क पर तालिबानी अदालत लगाने वाले खुले क्यों? 10-15 लोगों ने सरेराह दो युवकों को अगवा कर 3 घंटे बंधक बनाए रखा और स्कैनर से फिरौती वसूली, फिर भी मुख्य आरोपी अब तक पुलिस की गिरफ्त से बाहर क्यों हैं?
- संडे का बहाना या रसूखदारों को बचाने का खेल? खून से लथपथ पीड़ितों को देखकर तत्काल नाकेबंदी करने के बजाय पुलिस ‘स्टाफ कम है’ का बहाना बनाकर सोती क्यों रही?
- कहानी बदलने की साजिश किसके इशारे पर? सरेराह लूट और बंधक बनाने की घटना को क्या जानबूझकर ‘आपसी रंजिश या लड़कीबाजी’ बताकर कमजोर किया जा रहा है?
- सिम्स प्रबंधन पर कब होगी कार्रवाई? सिर में चोट और गंभीर दर्द से कराहते नाबालिग को बिना मुकम्मल इलाज के जबरन डिस्चार्ज करने वाले डॉक्टरों पर स्वास्थ्य विभाग कब संज्ञान लेगा?
- गरीब के लिए कानून अलग क्यों? अस्पताल के बाहर भटक रहे बेबस गरीब परिवार को अपनी ही सरकार के सिस्टम से इंसाफ के लिए गिड़गिड़ाना क्यों पड़ रहा है?
बिलासपुर का यह पूरा मामला केवल एक मारपीट की वारदात नहीं, बल्कि यह दिखाता है कि किस तरह पुलिस और अस्पताल मिलकर पीड़ित को ही कटघरे में खड़ा कर देते हैं। अब देखना यह है कि आला अधिकारी इस पूरे सिंडिकेट पर नकेल कसते हैं या फाइलों में इस खौफनाक वारदात को दबा दिया जाता है।
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