कोरिया में 170(ख) के दुरुपयोग पर SDM कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला : फर्जी पंचनामे और झूठे कब्जे की साजिश बेनकाब, गैर-आदिवासी के नाम हुआ आदेश निरस्त…

कोरिया। जिले में आदिवासियों के संवैधानिक भू-अधिकारों की रक्षा के लिए बनाए गए कानून (धारा 170-ख) के दुरुपयोग का एक बेहद गंभीर मामला सामने आया है। न्यायालय अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) बैकुंठपुर ने पूरे षड्यंत्र को उजागर करते हुए गैर-आदिवासी के पक्ष में पूर्व में पारित फर्जी आदेश को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया है। एसडीएम कोर्ट ने साफ निर्देश दिया है कि राजस्व रिकॉर्ड से अनावेदिका का नाम विलोपित कर जमीन पुनः मूल आदिवासी महिला के नाम दर्ज की जाए।

फर्जीवाड़े की पूरी क्रोनोलॉजी : कैसे रची गई थी जमीन हड़पने की पटकथा –
- भूमि का मूल इतिहास : ग्राम पौंड़ी (तहसील पौंड़ी-बचरा) स्थित खसरा नंबर 1241/4, रकबा 0.100 हेक्टेयर जमीन 7 मार्च 2023 से पहले धर्मेंद्र सिंह पिता अमर सिंह गौड़ के नाम पर दर्ज थी।
- आदिवासी महिला द्वारा क्रय : इस जमीन को उरांव जनजाति की दानी टोप्पो (पति रमेश टोप्पो, निवासी भगवानपुर, अंबिकापुर) ने 07 मार्च 2023 को विधिवत रजिस्टर्ड विक्रय पत्र के माध्यम से खरीदा था।
- झूठे 40-50 साल के कब्जे का दावा : जमीन की रजिस्ट्री के बाद अनावेदिका सुमनलता साहू (पति ईश्वर प्रसाद साहू, निवासी ग्राम सकरिया) ने तत्कालीन राजस्व अमले के साथ साठगांठ कर धारा 170(ख) के तहत प्रकरण तैयार करवाया। इसमें झूठा दावा किया गया कि वह इस जमीन पर मकान, बाड़ी और बाउंड्री बनाकर पिछले 40 से 50 वर्षों से काबिज हैं।
- फर्जी रिपोर्ट और आदेश : तत्कालीन राजस्व निरीक्षक (RI) ने मौके की सच्चाई छिपाते हुए एक मनगढ़ंत पंचनामा तैयार किया। इसके आधार पर 14 जनवरी 2026 को गैर-आदिवासी सुमनलता साहू के पक्ष में नामांतरण व व्यवस्थापन का आदेश करा लिया गया।
पटवारी और RI की रिपोर्ट का टकराव : यहीं से खुला खेल – साजिश का पर्दाफाश तब हुआ जब दोनों जमीनी अधिकारियों की रिपोर्ट आमने-सामने आई :
- पटवारी का अभिलेख : भूमि विक्रय के समय हल्का पटवारी द्वारा रजिस्ट्री हेतु दी गई ऑनलाइन चौहद्दी व नक्शे में खसरा नंबर 1241/4 की जमीन पूरी तरह रिक्त (खाली) दर्ज थी। वहां किसी पुराने मकान का कोई जिक्र तक नहीं था।
- RI की फर्जी जांच : वहीं तत्कालीन राजस्व निरीक्षक ने दावा कर दिया कि जमीन पर 40-50 साल पुराना मकान और बाड़ी मौजूद है।
एक ही जमीन पर एक तरफ जमीन खाली दिखाना और दूसरी तरफ आधा सदी पुराना कब्जा दिखाना राजस्व विभाग की खुली मिलीभगत को उजागर कर रहा था।
कलेक्टर से धारा 51 में रिव्यू की अनुमति, फिर नई जांच में हुआ ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ – आदेश में गंभीर विसंगति और त्रुटिपूर्ण रिपोर्ट सामने आने के बाद एसडीएम न्यायालय ने छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता 1959 की धारा 51 के तहत कलेक्टर जिला कोरिया से पुनर्विलोकन (Review) की विधिवत अनुमति प्राप्त की।
कलेक्टर कोरिया से अनुमति मिलने के बाद वर्तमान राजस्व निरीक्षक (पौंड़ी-बचरा) से मौके की नए सिरे से विस्तृत जांच कराई गई। इस जांच में निम्नलिखित तथ्य दर्ज हुए:
- सरहदी किसानों के बयान : पूर्व भूमिस्वामी धर्मेंद्र सिंह और आसपास के सीमावर्ती कृषकों ने स्पष्ट बयान दिया कि जमीन पर पहले कोई मकान या निर्माण था ही नहीं।
- व्यावसायिक इस्तेमाल : जमीन पर बाद में सुमनलता साहू द्वारा अलग-अलग दो कमरों का निर्माण कराया गया और वर्तमान में उस संपूर्ण जमीन का विशुद्ध रूप से व्यावसायिक उपयोग किया जा रहा था।
- फर्जी पंचनामा उजागर : नई जांच रिपोर्ट ने साबित कर दिया कि तत्कालीन राजस्व निरीक्षक द्वारा 40-50 वर्ष पुराने कब्जे का जो प्रतिवेदन दिया गया था, वह पूरी तरह भ्रामक और गलत पंचनामे पर आधारित था।
न्यायालय का कड़ा रुख और अंतिम आदेश – एसडीएम कोर्ट ने सभी मूल दस्तावेजों, पटवारी चौहद्दी और नई जांच रिपोर्ट का सूक्ष्म अवलोकन करने के बाद फैसला सुनाया कि इस प्रकरण में छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता 1959 की धारा 170(ख) की उपधारा-3 के प्रावधान लागू ही नहीं होते हैं। न्यायालय ने 14 जनवरी 2026 के आदेश को गलत जानकारी और त्रुटिपूर्ण रिपोर्ट पर आधारित मानते हुए निरस्त कर दिया।
कोर्ट द्वारा जारी सख्त दिशा-निर्देश:
- तहसीलदार को आदेश : तहसीलदार पौंड़ी-बचरा को निर्देशित किया गया है कि वे खसरा नंबर 1241/4 (रकबा 0.100 हेक्टेयर) से गैर-आदिवासी सुमनलता साहू का नाम राजस्व रिकॉर्ड से तत्काल विलोपित (काटें) करें और भूमि को पूर्ववत आदिवासी पक्षकार दानी टोप्पो के नाम पर दर्ज कर पालन प्रतिवेदन प्रस्तुत करें।
- लेनदेन की वापसी : आदिवासी पक्षकार द्वारा वर्तमान बाजार भाव के अनुसार प्राप्त की गई 7,34,000 रुपये (सात लाख चौंतीस हजार रुपये) की राशि चेक के माध्यम से गैर-आदिवासी पक्षकार को वापस लौटाई जाए।
इस फैसले ने न केवल एक आदिवासी महिला की जमीन को भू-माफियाओं के चंगुल से बचाया है, बल्कि यह भी स्पष्ट संदेश दिया है कि राजस्व अमले की मिलीभगत से गढ़े गए फर्जी दस्तावेज कानून के कटघरे में टिक नहीं सकते।




