लैलूंगा : अगर पहली बार ‘सेटलमेंट’ का खेल न खेला गया होता, तो क्या गर्भवती होती नाबालिग? सवालों के घेरे में लैलूंगा थाना प्रभारी और बिच के दलाल…

रायगढ़। अगर कानून के रखवाले ही कानून को ताक पर रखकर सौदेबाजी की टेबल सजा दें, तो इंसाफ की उम्मीद किससे की जाए? लैलूंगा थाना क्षेत्र के ग्राम राजपुर से सामने आया यह सनसनीखेज मामला न केवल खाकी की कार्यप्रणाली को बेनकाब करता है, बल्कि सीधे तौर पर यह सवाल खड़ा करता है कि अगर पहली ही शिकायत पर नाबालिग के अपहरण और दुष्कर्म के मामले में सख्त कानूनी कार्रवाई हुई होती, तो क्या आज वह 17 वर्षीय मासूम गर्भवती होती?
कानूनन पॉक्सो (POCSO) और नाबालिग से जुड़े गंभीर मामलों में समझौता गैरकानूनी और अपराध है, लेकिन आरोप है कि लैलूंगा थाने के भीतर कानून की धज्जियां उड़ाते हुए बंद कमरे में समझौते का गंदा खेल खेला गया।
पॉक्सो एक्ट की धज्जियां: थाने के चैंबर में बना राजीनामे का अड्डा – नाबालिग की मां द्वारा पुलिस अधीक्षक (SP) और पुलिस महानिदेशक (DGP) को सौंपे गए शिकायती पत्र के अनुसार, गांव का ही युवक निखिल मांझी (पिता सुशील मांझी) नाबालिग को लगातार अपनी हवस का शिकार बनाता रहा।
- पहली शिकायत और ‘सुलह का दबाव’ : जब पीड़िता को पहली बार भगाकर ले जाया गया, तो परिजन गुहार लगाने लैलूंगा थाने पहुंचे। आरोप है कि थाना प्रभारी ने FIR दर्ज करने के बजाय आरोपी और पीड़िता को अपने चैंबर में बैठाकर जबरन राजीनामा करवा दिया और परिजनों को झूठा आश्वासन देकर घर भेज दिया।
- हौसले बढ़े और मासूम हो गई गर्भवती : पुलिस की इसी ढिलाई और कथित संरक्षण के कारण आरोपी के हौसले बुलंद हो गए। उसने दोबारा नाबालिग को अगवा किया, किराए के कमरे में रखकर दैहिक शोषण व मारपीट की, जिसके परिणामस्वरूप पीड़िता 3 माह की गर्भवती हो गई।
- तीसरी बार भी भगाया गया : जब पीड़िता गर्भवती अवस्था में घर लौटी और मां दोबारा थाने पहुंची, तो आरोप है कि थाना प्रभारी ने फिर से सुलह कराने का दबाव बनाया और विरोध करने पर मां को “तुम कुछ नहीं जानती” कहकर थाने से भगा दिया।
50 हजार का कथित लेनदेन और दलालों का सिंडिकेट : शिकायत पत्र में बेहद गंभीर और चौंकाने वाले खुलासे किए गए हैं। आरोप है कि मामले को दबाने के लिए ₹50,000 के कथित आर्थिक लाभ और प्रभाव का खेल खेला गया।
- शिकायत में आरोप लगाया गया है कि थाना प्रभारी और स्थानीय कुछ रसूखदारों (धर्मेंद्र कुमार बंगाली, भुनेश्वर कंवर, पाला बाई, भुजवल आदि) ने मिलकर एक साजिश के तहत राजीनामे का दबाव बनाया।
- कानून के जानकारों का कहना है कि जब कोई अपराध गैर-शमनीय (Non-Compoundable) और पॉक्सो के दायरे में आता है, तो पुलिस अधिकारी द्वारा उस पर राजीनामा करवाना सीधे तौर पर आपराधिक षड्यंत्र और कर्तव्य के प्रति गंभीर लापरवाही की श्रेणी में आता है।
घर में घुसकर मारपीट और जान से मारने की धमकी – आरोपियों की दबंगई यहीं नहीं रुकी। पीड़िता के परिजनों का कहना है कि आरोपी निखिल मांझी, उसकी पत्नी और पिता सुशील मांझी द्वारा घर में घुसकर गाली-गलौज व मारपीट की गई और पूरे परिवार को जान से मारकर फेंकने की धमकियां दी जा रही हैं।
SP के दखल के बाद अपराध दर्ज, पर रसूखदारों पर कार्रवाई कब? – पीड़िता की मां का स्पष्ट कहना है कि यदि पहली ही बार में लैलूंगा पुलिस ने ईमानदारी से अपनी ड्यूटी निभाई होती और आरोपी को सलाखों के पीछे भेजा होता, तो आज उस मासूम बच्ची का जीवन इस तरह नर्क नहीं बनता।
हालांकि, एसपी के हस्तक्षेप के बाद मामले में अपराध क्रमांक 253/2026 पंजीबद्ध किया गया है, लेकिन बड़ा सवाल यह बना हुआ है कि मासूम की जिंदगी को दांव पर लगाकर राजीनामे की दलाली करने वालों और इस पूरे खेल में शामिल पुलिसकर्मियों पर सख्त कानूनी हथौड़ा कब चलेगा? पीड़ित परिवार ने अब उच्च स्तरीय जांच और दोषियों की तत्काल गिरफ्तारी की मांग की है।
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