रक्षक या भक्षक? सरगुजा पुलिस का खौफनाक सच! पंकज बेक मौत मामले में 7 साल बाद कोर्ट का अल्टीमेटम- “निष्पक्ष जांच करो या केस CBI को दो”…

सरगुजा।: न्याय की देवी की आंखों पर बंधी पट्टी से भले ही आम आदमी को नाउम्मीदी हो, लेकिन अदालत की तेज नजर से ‘खाकी’ के काले कारनामे छिप नहीं सके। 21 जुलाई 2019 की वह खौफनाक रात, जब चोरी के शक में उठाए गए आदिवासी युवक पंकज बेक को थाने में ऐसी अमानवीय यातनाएं दी गईं कि उसकी रूह तक कांप गई और अंततः उसकी सांसें थम गईं। अब, इस बहुचर्चित कस्टोडियल डेथ (हिरासत में मौत) मामले में अदालत ने ऐसा चाबुक चलाया है कि पूरे पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया है।
क्या है अदालत का सख्त निर्देश? – सप्तम अपर सत्र न्यायाधीश एम. राज की अदालत ने पुलिस की लीपापोती को सिरे से खारिज करते हुए आईजी (IG) को दो टूक शब्दों में निर्देश दिया है:
- नए सिरे से जांच : एसपी (SP) के नेतृत्व में पूरे मामले की शुरुआत से दोबारा जांच की जाए।
- CBI को सौंपने की चेतावनी : यदि पुलिस महकमा खुद के गिरेबान में झांककर निष्पक्ष जांच करने में अक्षम है, तो यह मामला सीधे सीबीआई (CBI) के हवाले कर दिया जाए।
वह खौफनाक रात : उल्टा लटकाया, बेतहाशा पीटा और फिर खामोशी… इस बर्बर दास्तान का चश्मदीद गवाह इमरान है, जिसकी गवाही पुलिस की दरिंदगी की परतें उधेड़ती है:
- इमरान के मुताबिक, थाने के भीतर उसे और पंकज को पैर बांधकर उल्टा लटका दिया गया और रातभर जानवरों की तरह पीटा गया।
- दर्द से तड़पते पंकज की चीखें बगल के कमरे से आ रही थीं… और फिर अचानक वह चीखें हमेशा के लिए खामोश हो गईं।
- पुलिस की क्रूरता और साजिश का अंत यहीं नहीं हुआ— अगली सुबह पंकज की लाश परमार अस्पताल के विंडो कूलर के भीतर एक बेहद संदिग्ध और रहस्यमयी अवस्था में बैठी हुई मिली।
रसूख का खूनी खेल : सबूतों से छेड़छाड़ और कोर्ट को गुमराह करने की साजिश – पीड़ित परिवार के अधिवक्ता के खुलासे सिस्टम के मुंह पर करारा तमाचा हैं। खाकी वर्दी वालों ने अपने गुनाह छिपाने के लिए हर मर्यादा लांघ दी:
- पीएम रिपोर्ट में फर्जीवाड़ा : पोस्टमार्टम रिपोर्ट चीख-चीख कर कह रही थी कि पंकज के शरीर पर 10 प्रकार की गंभीर चोटों के निशान थे। लेकिन सत्ता और वर्दी के रसूख तले, आरोपियों ने कंधे और पैर की गंभीर चोटों को पीएम रिपोर्ट में फर्जी तरीके से बदलवा दिया।
- गुनहगारों की फेहरिस्त : हत्या और साजिश के आरोप सीधे तौर पर तत्कालीन टीआई विनीत दुबे, सब-इंस्पेक्टर मनीष यादव, एएसआई प्रियेश जॉन और अन्य आरक्षकों पर लगे हैं।
- क्लोजर रिपोर्ट का धोखा : आरोपियों ने न केवल सबूतों से बेशर्मी से छेड़छाड़ की, बल्कि अदालत को गुमराह करते हुए मामले को रफा-दफा करने के लिए ‘क्लोजर रिपोर्ट’ भी पेश कर दी थी।
बड़ा सवाल: जो पुलिस आम जनता की सुरक्षा के लिए बनी है, जब वही कातिल बन जाए और सुबूत मिटाने लगे, तो न्याय की गुहार किससे लगाई जाए? अदालत के इस कड़े रुख ने स्पष्ट कर दिया है कि पंकज बेक को न्याय मिलने की उम्मीद अभी जिंदा है। अब देखना यह है कि पुलिस खुद निष्पक्ष जांच कर अपने दामन के दाग धोती है या फिर CBI सरगुजा पुलिस के इस काले सच से पर्दा उठाती है।




