बिलासपुर

खाकी का ‘गुंडाराज’ पड़ा भारी : बिना FIR होटल मालिक को जेल भेजने पर हाईकोर्ट का हंटर; पुलिस पर 1 लाख का जुर्माना, सैलरी से होगी वसूली…

बिलासपुर। वर्दी की हनक और कानून को जेब में रखने का गुमान दुर्ग पुलिस के अधिकारियों को महंगा पड़ गया है। ‘गुमशुदा लड़की की तलाश’ के नाम पर होटल में घुसकर गुंडागर्दी करने, निजता की धज्जियां उड़ाने और मालिक को बिना किसी गुनाह के जेल भेजने वाले पुलिस अफसरों को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने ऐसा सबक सिखाया है जो नज़ीर बन गया है।

हाईकोर्ट ने न सिर्फ गिरफ्तारी को अवैध करार दिया है, बल्कि पुलिस पर 1 लाख रुपए का जुर्माना ठोका है। कोर्ट ने साफ कह दिया है – “यह हर्जाना सरकार भरे, लेकिन बाद में दोषी पुलिस वालों की सैलरी से वसूले।”

क्या था पूरा मामला? वर्दीवाला ‘आतंक’ – घटना 8 सितंबर 2025 की है। दुर्ग के एक होटल में पुलिस की टीम ‘सिंघम’ बनकर घुसी।

  • बहाना : एक गुमशुदा लड़की की तलाश।
  • हकीकत : पुलिस ने बिना किसी महिला अधिकारी के होटल के कमरों में धावा बोल दिया। वहां रुके प्रेमी जोड़ों को बाहर निकाला और मैनेजर के साथ गाली-गलौज की।
  • दबंगई : जब होटल मालिक और लॉ स्टूडेंट आकाश साहू (30) ने इसका विरोध किया और नियम पूछे, तो पुलिस का अहंकार आड़े आ गया।
  • मारपीट : पुलिस ने आकाश को बुरी तरह पीटा और थाने ले गई। वहां भी थर्ड डिग्री का इस्तेमाल हुआ और बिना किसी FIR के बीएनएस की धारा 170 (शांति भंग) के तहत जेल भेज दिया गया।

हाईकोर्ट में पुलिस की दलीलें ‘ताश के पत्तों’ की तरह बिखरीं – ​पीड़ित आकाश साहू ने हार नहीं मानी और हाईकोर्ट की शरण ली। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच के सामने जब पुलिस ने अपनी सफाई पेश की, तो कोर्ट ने उसे सिरे से खारिज कर दिया।

  • पुलिस का झूठ: पुलिस ने कहा कि आकाश ने सरकारी काम में बाधा डाली, चाबी छीनी और हाथापाई की।
  • कोर्ट का सवाल: अगर इतना सब हुआ, तो कोई संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) की FIR क्यों नहीं दर्ज की गई? महज संदेह और कहासुनी पर किसी को जेल कैसे भेजा जा सकता है?
  • फैसला: कोर्ट ने माना कि गिरफ्तारी के मेमो पर आकाश ने लिखा था – “मुझे मामले की जानकारी नहीं है।” यह साफ करता है कि पुलिस ने कानून का मखौल उड़ाया था।

SDM को भी फटकार : “आंख मूंदकर काम न करें” – हाईकोर्ट का गुस्सा सिर्फ पुलिस तक सीमित नहीं रहा। कोर्ट ने सब डिवीजनल मजिस्ट्रेट (SDM) की कार्यशैली पर भी तीखी टिप्पणी की।

कोर्ट ने कहा : “मजिस्ट्रेट को ‘न्यायिक प्रहरी’ होना चाहिए, लेकिन यहां उन्होंने बिना दिमाग लगाए पुलिस की रिपोर्ट पर रबर स्टैंप की तरह मुहर लगा दी और एक निर्दोष को जेल भेज दिया।”

हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला : अब भुगतेंगे दोषी अफसर

  • केस खत्म : आकाश साहू के खिलाफ चल रही सभी आपराधिक कार्रवाई और पुलिस का इस्तगासा तत्काल प्रभाव से रद्द।
  • मुआवजा : राज्य सरकार पीड़ित को 4 सप्ताह के भीतर 1 लाख रुपए का भुगतान करे।
  • वसूली : सरकार जांच करे और यह राशि दोषी पुलिस अधिकारियों के वेतन से काटे।
  • ब्याज : अगर भुगतान में देरी हुई, तो 9% सालाना ब्याज अलग से देना होगा।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी: “वर्दी जनता का भरोसा तोड़ेगी तो कैसे चलेगा?” – बेंच ने फैसले में लिखा कि हिरासत में दिया गया मानसिक तनाव और अपमान अनुच्छेद 21 (जीने का अधिकार) का सीधा उल्लंघन है। पुलिस के ऐसे अवैध काम आपराधिक न्याय प्रणाली से जनता का भरोसा उठा देते हैं। कोर्ट ने गृह सचिव को आदेश दिया है कि पुलिस को मानवाधिकारों का पाठ पढ़ाया जाए, ताकि भविष्य में ऐसी ‘गुंडागर्दी’ न हो।

Admin : RM24

Investigative Journalist & RTI Activist

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