“कोरोना योद्धाओं के लिए रामलीला मैदान बना जेल – सरकार ने कैद किया स्वास्थ्य मिशन!”

रायगढ़, 21 अगस्त 2025। छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के 16,000 से अधिक संविदा स्वास्थ्यकर्मी, जिनमें रायगढ़ जिले के 550 कर्मचारी शामिल हैं, अपनी 10 सूत्रीय मांगों के लिए अनिश्चितकालीन हड़ताल पर डटे हैं। लेकिन लोकतांत्रिक अधिकारों की आवाज उठाने वालों के साथ सरकार का बर्ताव आज सवालों के घेरे में है।
रामलीला मैदान का गेट बंद कर कर्मचारियों को वहीं कैद कर देना… क्या यही है लोकतंत्र? जिन स्वास्थ्यकर्मियों को कोरोना काल में “कोरोना योद्धा” कहा गया, तालियां-थाली बजाकर सम्मानित किया गया – आज वही कर्मचारी रैली तक निकालने की अनुमति से वंचित हैं। सवाल उठता है, क्या “राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन” अब “दमन मिशन” में बदल गया है?
ठप पड़ी स्वास्थ्य सेवाएं – 28 मौतों का आरोप सरकार पर
एनएचएम कर्मियों की हड़ताल से पूरे प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था चरमराई हुई है। रायगढ़ समेत ग्रामीण-शहरी क्षेत्रों के ओपीडी, इमरजेंसी, संस्थागत प्रसव, नवजात शिशु वार्ड, टीकाकरण, टीबी-मलेरिया जांच, पोषण आहार केंद्र, ब्लड-शुगर टेस्ट, ट्रूनाट-सीबीनाट जांच, स्कूल स्वास्थ्य परीक्षण जैसी सभी सेवाएं बंद पड़ी हैं।
स्वास्थ्यकर्मियों का आरोप है कि सरकारी बेरुखी से अब तक 28 मरीजों की मौत हो चुकी है। सवाल यह है कि क्या सरकार का नया “स्वास्थ्य मिशन” अब इलाज के बजाय इंतजार में मौत है?
प्रदर्शन स्थल पर गूंजे तंज – “हमारी भूल, कमल का फूल”
आज कर्मचारियों ने काले कपड़े पहनकर विशाल रैली निकालने की कोशिश की, लेकिन प्रशासन ने जिला भाजपा कार्यालय, विधायक निवास और गांधी प्रतिमा तक मार्च करने की अनुमति नहीं दी। इसके विरोध में शहीद कर्नल विप्लव त्रिपाठी मिनी स्टेडियम में 550 से अधिक कर्मचारी लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं।
धरना स्थल पर नारेबाजी गूंज रही है –
👉 “हमारी भूल – कमल का फूल”
👉 “नियमितीकरण दो, वादा निभाओ”
100 दिन का वादा, 20 महीने का इंतजार
मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री ने सत्ता में आने से पहले 100 दिनों के भीतर नियमितीकरण की कमेटी बनाने का वादा किया था। लेकिन 20 महीने बीतने और 160 से ज्यादा ज्ञापन सौंपने के बावजूद कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
प्रदेश अध्यक्ष डॉ. अमित कुमार मिरी, डॉ. रवि शंकर दीक्षित और प्रवक्ता पूरन दास ने आरोप लगाया –
“सरकार ने खुद स्वीकृत आदेशों को ठंडे बस्ते में डाल दिया। स्वास्थ्यकर्मियों को आंदोलन के लिए मजबूर किया गया। क्या 20 साल की सेवा का इनाम सिर्फ तालियां हैं?”
जिला अध्यक्ष शकुंतला एक्का ने चेतावनी दी –
“यदि सरकार ने मांगों पर तुरंत लिखित आश्वासन नहीं दिया तो आंदोलन और उग्र होगा। 6,239 स्वास्थ्य संस्थाएं प्रभावित हो चुकी हैं। क्या सरकार चाहती है कि स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह ठप हो जाएं?”
कर्मचारियों की 10 बड़ी मांगें – जिन्हें सरकार ने ठुकराया :
- संविलियन/स्थायीकरण – 20 साल से जारी अस्थायी सेवा का अंत
- पब्लिक हेल्थ कैडर की स्थापना
- ग्रेड-पे निर्धारण और वेतन वृद्धि
- कार्य मूल्यांकन में पारदर्शिता
- लंबित 27% वेतन वृद्धि का भुगतान
- नियमित भर्ती में सीट आरक्षण
- अनुकम्पा नियुक्ति
- मेडिकल और अन्य अवकाश का अधिकार
- पारदर्शी स्थानांतरण नीति
- 10 लाख का कैशलेस चिकित्सा बीमा
बड़ा सवाल :
- जिन स्वास्थ्यकर्मियों ने महामारी में अपनी जान दांव पर लगाकर लाखों लोगों की जिंदगी बचाई, उन्हें आज सरकार जेलनुमा मैदान में कैद कर रही है।
- क्या यह लोकतंत्र है?
- क्या यही है “कमल का राज”?
- या सचमुच “राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन” अब “राष्ट्रीय शोषण मिशन” बन चुका है?
अब इस पर अंतिम फैसला जनता और मरीजों के बीच है – क्या सरकार की चुप्पी इन योद्धाओं को खत्म कर देगी, या आवाज उठाने वाले कर्मचारियों के साथ पूरा प्रदेश खड़ा होगा?