खाकी का ‘खसरा’ कांड : ड्यूटी से ‘तलाक’ और सरकारी जमीन से ‘निकाह’ रचाने वाले प्रधान आरक्षक की दास्तान!…

अम्बिकापुर। विशेष ‘जहरीली’ रिपोर्ट।…अगर आपको लगता है कि छत्तीसगढ़ पुलिस केवल अपराधियों को सलाखों के पीछे डालती है, तो आप गलतफहमी के शिकार हैं। सरगुजा संभाग में एक ऐसे ‘हुनरमंद’ प्रधान आरक्षक रविन्द्र भारती अवतरित हुए हैं, जिन्होंने वर्दी को ‘रियल एस्टेट’ का लाइसेंस समझ लिया है। साहब की प्रतिभा ऐसी है कि वे सूरजपुर पुलिस लाइन में “अटैच” होकर भी ड्यूटी से “डिटैच” (फरार) हैं। विभाग वेतन रोककर बैठा है, पर जिसे 2 एकड़ सरकारी जमीन का ‘लंगर’ मिल गया हो, उसे चंद रुपयों की सूखी रोटी की क्या परवाह?
तबादला, सेटिंग और ‘गायब’ होने की कला : साहब का तबादला एमसीबी जिला हुआ था, पर शायद वहां की मिट्टी में ‘कब्जा करने’ वाली उर्वरता कम थी। अतः साहब ने रसूख के ऐसे पैंतरे चले कि खुद को सूरजपुर पुलिस लाइन में ही टिका लिया। लेकिन असली चमत्कार तो देखिए – साहब पिछले एक महीने से ड्यूटी से ऐसे नदारद हैं जैसे गधे के सिर से सींग। विभाग फाइलें ढूंढ रहा है और भारती जी शायद अजीरमा की जमीन पर ‘शासकीय सुख’ ढूंढ रहे हैं।
अजीरमा में ‘भारती साम्राज्य’ का उदय : पटवारी हल्का नंबर-56 के ग्राम अजीरमा में खसरा नंबर 74/1 (शासकीय भूमि) की किस्मत रातों-रात बदल गई है। शिकायतकर्ता जितेन्द्र कुमार जायसवाल के अनुसार, इस 2 एकड़ सरकारी चरागाह को भारती जी ने अपनी “पुश्तैनी जागीर” समझकर वहां शेड निर्माण का महायज्ञ शुरू कर दिया है। साहब अजीरमा के निवासी तक नहीं हैं, पर “पद के दुरुपयोग” का ऐसा फेविकोल लगाया है कि सरकारी जमीन से चिपके ही जा रहे हैं।
कानून का ‘कत्ल’ और साहब का ‘कब्जा’ : छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 248 शायद आम जनता के लिए बनी है। वर्दीधारी साहब के लिए तो यह महज एक कागज का टुकड़ा है। जब रक्षक ही “भक्षक” बनकर सरकारी जमीन पर ईंटें बिछाने लगे, तो समझ लीजिए कि कानून अब साहब के ‘शेड’ के नीचे विश्राम कर रहा है।
प्रशासन से ‘मासूम’ फरियाद : शिकायत की फाइल कलेक्टर, एसडीएम और तहसीलदार की मेज पर इस उम्मीद में पड़ी है कि शायद प्रशासन को अपनी ही जमीन की ममता जाग जाए। मांग की गई है कि :
- तत्काल पटवारी जी को नींद से जगाकर ‘स्थल जांच’ का कष्ट दिया जाए।
- साहब के इस “अवैध प्रेम-प्रसंग” (अतिक्रमण) पर बुलडोजर की कृपा बरसे।
- ड्यूटी से ‘मौज’ काटने वाले इस कर्मचारी पर ऐसी विभागीय गाज गिरे कि वर्दी की गरिमा फिर से सांस ले सके।
पुलिस विभाग की छवि पर भारती जी ने जो “अवैध शेड” डाला है, क्या प्रशासन उसे उखाड़ने का दम रखता है? या फिर “विशेष कृपा” का कवच ऐसे ही सरकारी जमीनों की बलि चढ़ाता रहेगा? साहब की इस ‘भूमि-भक्ति’ को देखकर तो यही लगता है कि अब पुलिस की ट्रेनिंग में ‘कब्जा कैसे करें’ का एक नया कोर्स जुड़ जाना चाहिए।




