रायगढ़

अपडेट : गरीब की जान, सिस्टम का ‘मजाक’! खरसिया कस्टोडियल डेथ : हत्या का आरोप, पर ‘लाइन अटैच’ का झुनझुना; क्या यही है न्याय?…

रायगढ़। खाकी के टॉर्चर से थमी एक गरीब की सांसों का सौदा आखिरकार ‘कलेक्टर दर’ की एक अदना सी नौकरी और ‘लाइन अटैच’ की रस्म अदायगी के साथ खत्म हो गया। बोतल्दा NH-49 पर घंटों चले जिस आक्रोश ने प्रशासन के पसीने छुड़ा दिए थे, उसका अंत एक ऐसे ‘एंटी-क्लाइमेक्स’ के साथ हुआ जिसने न्याय व्यवस्था और राजनीतिक मध्यस्थता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

ब्रेन हेमरेज से मौत, पर कार्रवाई सिर्फ ‘कागजी’ – परसकोल के रमेश चौहान की मेडिकल रिपोर्ट चीख-चीख कर कह रही है कि उसके सिर की नस फटने (ब्रेन हेमरेज) से मौत हुई। परिजनों और प्रत्यक्षदर्शियों का सीधा आरोप है कि पुलिसिया ‘थर्ड डिग्री’ ने रमेश की जान ली। लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि इतने संगीन मामले में, जहां (हत्या) के तहत FIR होनी चाहिए थी, वहां प्रशासन ने महज दो आरक्षकों को ‘लाइन अटैच’ कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया। सवाल यह है कि क्या किसी की जान लेने की सजा सिर्फ दफ्तर बदलना है?

‘कलेक्टर दर’ की नौकरी : न्याय या लाचारी का फायदा? – कस्टोडियल डेथ जैसे जघन्य मामले में पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने के नाम पर प्रशासन ने ‘कलेक्टर दर’ (दैनिक वेतन भोगी) की नौकरी का जो आश्वासन दिया है, वह किसी ‘लॉलीपॉप’ से कम नहीं लगता।

  • ​क्या एक निर्दोष ग्रामीण की जिंदगी की कीमत सिर्फ चंद हजार रुपयों की संविदा नौकरी है?
  • ​क्या असली गुनहगारों को बचाने के लिए गरीब परिवार की आर्थिक लाचारी का फायदा उठाया गया?

विधायक की मध्यस्थता और ‘समझौते’ का खेल : ​दोपहर से सड़क पर उतरी हजारों की भीड़ और चक्काजाम के बीच जब खरसिया विधायक उमेश पटेल पहुंचे, तो उम्मीद थी कि दोषियों को जेल भेजा जाएगा। लेकिन घंटों की बंद कमरा चर्चा के बाद जो ‘सौदा’ निकलकर सामने आया, उसने सबको चौंका दिया।

सवाल यह उठता है कि : जब असली कातिल पकड़ा जा चुका था, तो पूछताछ के नाम पर निर्दोष रमेश को मौत के घाट उतारने वाले पुलिसकर्मियों पर FIR दर्ज कराने के बजाय उन्हें ‘लाइन अटैच’ और ‘न्यायिक जांच’ के लंबे भरोसे पर क्यों छोड़ दिया गया?

न्यायिक जांच का ‘झुनझुना’ और 5 नाम : ​भीड़ को शांत करने के लिए प्रशासन ने ‘न्यायिक जांच’ का पुराना पैंतरा चला है। ग्रामीणों से 5 नाम मांगे गए हैं जो जांच प्रक्रिया का हिस्सा होंगे। जानकार इसे सिर्फ मामला ठंडा करने की प्रक्रिया मान रहे हैं, क्योंकि पूर्व में ऐसी जांचें अक्सर फाइलों में दबकर रह जाती हैं।

सिस्टम से सीधा सवाल : NH-49 पर यातायात तो बहाल हो गया, चक्काजाम भी खुल गया और नारेबाजी भी थम गई, लेकिन रायगढ़ की जनता के मन में एक टीस बाकी है- “अगर मरने वाला किसी रसूखदार परिवार का होता, तो क्या तब भी न्याय का तराजू इसी तरह काम करता?”

बड़ी बातें :

  • दोषी : हत्या का आरोप, पर सजा सिर्फ ‘लाइन अटैच’।
  • मुआवजा : 1 करोड़ की मांग के बदले ‘कलेक्टर दर’ की छोटी नौकरी।
  • जांच : मजिस्ट्रियल जांच का वादा, जो सालों खिंच सकती है।
  • अंजाम : एक गरीब की जान की कीमत पर प्रशासन ने बचाई अपनी साख।

“सत्ता की मध्यस्थता और सिस्टम की चालाकी ने एक गरीब की ‘हत्या’ को महज़ ‘लाइन अटैच’ और ‘कलेक्टर दर’ के समझौते में दफन कर दिया।”

पूर्व में प्रकाशित खबर :

Admin : RM24

Investigative Journalist & RTI Activist

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!