सुप्रीम कोर्ट की सख्त चेतावनी : क्या ‘मशीनी दिमाग’ तय करेगा न्याय?…

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक रुख अपनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि न्याय की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति अपनी विवेकशक्ति (Judicial Mind) को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के हवाले नहीं कर सकता। कोर्ट ने AI द्वारा तैयार सबूतों के आधार पर फैसला लिखने को “साधारण गलती” नहीं, बल्कि एक “गंभीर कदाचार” (Serious Misconduct) करार दिया है।
मामला क्या है? (पृष्ठभूमि) – विवाद की जड़ आंध्र प्रदेश का एक प्रॉपर्टी केस है, जहाँ अगस्त 2023 में एक ट्रायल कोर्ट ने AI द्वारा जेनरेट की गई तस्वीर को साक्ष्य मानकर अपना फैसला सुना दिया।
- हाईकोर्ट का रुख : जनवरी 2024 में आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने इस पर आपत्ति नहीं जताई और याचिका खारिज कर दी।
- सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप : जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने इस पर गहरा संज्ञान लिया है। कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल जैसे बड़े कानूनी अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब माँगा है।
सुप्रीम कोर्ट की मुख्य चिंताएँ – अदालत ने केवल एक फैसले पर नहीं, बल्कि न्यायपालिका की साख पर पड़ने वाले इसके असर पर सवाल उठाए हैं:
- विश्वसनीयता का संकट : यदि फैसले का आधार ही “नॉन-एग्जिटेंट” (गैर-मौजूद) या नकली सबूत होंगे, तो जनता का न्याय प्रणाली से भरोसा उठ जाएगा।
- ईमानदारी पर प्रहार : जस्टिस नरसिम्हा के अनुसार, यह सीधे तौर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया की शुचिता (Integrity) को प्रभावित करता है।
- पिटीशन का ट्रेंड : कोर्ट ने 17 फरवरी को भी चिंता जताई थी कि वकील अब अपनी याचिकाएँ लिखने के लिए भी AI टूल्स का सहारा ले रहे हैं, जो कि पेशेवर जिम्मेदारी से भागने जैसा है।
AI सबूतों के साथ जुड़े बड़े जोखिम – अदालत ने बिना सोचे-समझे तकनीक के इस्तेमाल को ‘जोखिम भरा’ माना है क्योंकि:
- हेरफेर (Manipulation) : AI इमेज या टेक्स्ट को इतनी बारीकी से बदला जा सकता है कि मानव आँखें फर्क नहीं कर पातीं।
- डीपफेक का जाल : कानूनी साक्ष्य के रूप में वीडियो या ऑडियो पेश किए जाने पर ‘डीपफेक’ न्याय को पूरी तरह से गुमराह कर सकता है।
- हैलुसिनेशन (Hallucination) : AI अक्सर गलत तथ्य या काल्पनिक केस कानूनों (Precedents) को सच बताकर पेश कर देता है।
क्या अब आएंगी नई गाइडलाइन्स? – इस मामले की अगली सुनवाई 10 मार्च को है, जिससे भारतीय न्यायपालिका में AI के उपयोग को लेकर नई नियमावली आने की प्रबल संभावना है:
- जवाबदेही तय करना : कोर्ट यह तय कर सकता है कि यदि कोई वकील या जज AI का गलत उपयोग करता है, तो उसके खिलाफ क्या कार्रवाई होगी।
- डिजिटल फॉरेंसिक : भविष्य में AI साक्ष्यों को पेश करने से पहले ‘डिजिटल फॉरेंसिक सत्यापन’ अनिवार्य किया जा सकता है।
- BCI की भूमिका : बार काउंसिल ऑफ इंडिया वकीलों के ‘प्रोफेशनल कंडक्ट’ (पेशेवर आचरण) के नियमों में संशोधन कर सकती है।
कानूनी पेशेवरों के लिए ‘चेकलिस्ट’ – सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े रुख के बाद वकीलों और जजों को इन बातों का ध्यान रखना होगा:
- सत्यापन सर्वोपरि : किसी भी डिजिटल सामग्री को सबूत के तौर पर पेश करने से पहले उसकी प्रमाणिकता की जांच करें।
- सहायक बनाम आधार : AI रिसर्च में आपकी सहायता कर सकता है, लेकिन वह फैसले का आधार या तर्क का स्रोत नहीं होना चाहिए।
- पेशेवर सत्यनिष्ठा : ड्राफ्टिंग के लिए अपनी बुद्धि और कानूनी ज्ञान का उपयोग करें, न कि केवल ‘प्रॉम्प्ट’ का।
तकनीक प्रगति का साधन है, न्याय का विकल्प नहीं। सुप्रीम कोर्ट का यह कदम यह सुनिश्चित करेगा कि भविष्य की अदालतों में ‘एल्गोरिदम’ नहीं, बल्कि ‘संविधान और सत्य’ की जीत हो।



