विशेष आलेख : ‘होली’ का बदलता स्वरूप – भक्ति की अग्नि से कलयुगी हुड़दंग तक की यात्रा…

भारतीय संस्कृति के कलेवर में ‘होली’ केवल रंगों का त्यौहार नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक चिकित्सा पद्धति थी। लेकिन कालचक्र के साथ, टेसू के फूलों की वह शीतल महक अब जहरीले रसायनों और कान फाड़ते डीजे के शोर में कहीं खो गई है। सतयुग के प्रह्लाद की ‘अटूट आस्था’ से शुरू हुआ यह सफर आज कलयुग के ‘सोशल मीडिया दिखावे’ पर आकर ठहर गया है।
ऐतिहासिक और पौराणिक नींव : जब ‘अधर्म’ जलता था – होली का मूल आधार ‘होलिका दहन’ है, जो हमें याद दिलाता है कि अधर्म का अंत निश्चित है।
- प्रह्लाद का संकल्प : यह संघर्ष एक निरंकुश शासक (हिरण्यकश्यप) और एक निश्छल बालक (प्रह्लाद) के बीच था। अग्नि ने उस ‘वरदान’ (होलिका) को भस्म कर दिया जो अहंकार का प्रतीक था।
- कृष्ण की रास-लीला : द्वापर युग में भगवान कृष्ण ने इसे ‘सामाजिक समरसता’ का रूप दिया। गोकुल और बरसाना की गलियों में ऊंच-नीच का भेद मिटाकर प्रेम की पिचकारी चली, जिसने रिश्तों की कड़वाहट को रंगों में घोल दिया।
वर्तमान का ‘कलयुगी’ रंग : कबीरा खड़ा बाज़ार में… आज की होली पर कबीर दास की ‘साखियों’ की धार सबसे सटीक बैठती है। वर्तमान विसंगतियों का 26-सूत्रीय ‘हंटर’ इस प्रकार है:
I. डिजिटल दिखावा और खोखले रिश्ते : आज लोग पड़ोसी के दरवाजे पर दस्तक देने के बजाय व्हाट्सएप पर ‘GIF’ भेजकर कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। कैमरे के सामने मुस्कुराहट तो है, पर दिल में अभी भी ईर्ष्या की राख दबी है।
कबीरा फेसबुक रँगा, रँगा व्हाट्सएप सार।
पड़ोसी पहचाने नहीं, यो कैसा त्यौहार ॥
II. ‘बुरा न मानो’ की आड़ में मर्यादा का हनन : “बुरा न मानो होली है” – यह वाक्य अब सार्वजनिक स्थानों पर अभद्रता करने का लाइसेंस बन गया है। जबरन रंग डालना, राहगीरों को परेशान करना और महिलाओं की गरिमा से खिलवाड़ करना उल्लास नहीं, बल्कि पतन की निशानी है।
III. नशे की गिरफ्त में त्यौहार : प्राचीन काल की ‘ठंडाई’ अब ‘देसी शराब’ और ‘सिंथेटिक ड्रग्स’ में तब्दील हो चुकी है। त्यौहार के नाम पर नालियों में पड़े ‘मदहोश हुड़दंगी’ इस पावन पर्व की गरिमा को तार-तार कर रहे हैं।
बाज़ारवाद का हमला : जहर बनता ‘रंगोत्सव’ – बाजार ने हमारी आस्था को ‘खपत’ (Consumption) में बदल दिया है :
- जहरीला मावा : त्यौहारों के सीजन में टनों नकली मावा और डिटर्जेंट वाली मिठाइयाँ बाजारों में खपाई जाती हैं। यह ‘रंगोत्सव’ कम और ‘बीमारी उत्सव’ ज्यादा हो गया है।
- रासायनिक युद्ध : आज हम अबीर नहीं, बल्कि सीसा (Lead), मरकरी और कांच के चूरे से होली खेलते हैं। यह किसी की आँखों और त्वचा पर सीधा हमला है।
- जल का अपव्यय : जहाँ दुनिया की बड़ी आबादी बूंद-बूंद को तरस रही है, वहाँ होली के नाम पर अरबों लीटर स्वच्छ जल की बर्बादी हमारी संवेदनहीनता का प्रमाण है।
सियासत और विभाजन की पिचकारी : होली का संदेश था – ‘सबका रंग एक’। लेकिन आज :
- राजनीतिक लाभ : नेताओं के लिए होली अब ‘शक्ति प्रदर्शन’ का जरिया है। गुलाल के रंगों में भी मजहब और वोट बैंक की गंध ढूंढी जाने लगी है।
- जातिवाद का जहर : कबीर ने कहा था कि सबका खून लाल है, फिर रंगों में भेद कैसा?
कबीरा सबहीं को रंग एक है, लोहू का रंग लाल।
छुआछूत की होरी खेलें, सो नर महा गाल ॥
पर्यावरण और जीव-जंतुओं पर अत्याचार : बेजुबान जानवरों पर पक्के रंग डालना और गुब्बारे मारना हमारी ‘मूर्खता’ को दर्शाता है। त्यौहार का अर्थ प्रकृति के साथ जुड़ना था, न कि उसे प्रदूषित करना और जीवों को कष्ट देना।
वापसी का मार्ग : होली को वापस ‘पावन’ बनाने के लिए हमें ‘कबीर की दृष्टि’ अपनानी होगी :
- मानसिक दहन : लकड़ियों के साथ अपने भीतर के क्रोध, लालच और अहंकार को जलाएं।
- मर्यादा का रंग : त्यौहार का आनंद वहीं तक रखें जहाँ दूसरे की स्वतंत्रता और सुरक्षा बाधित न हो।
- प्राकृतिक शुद्धि : जल संरक्षण और घर में बने प्राकृतिक रंगों का उपयोग ही भविष्य की होली है।
संपादकीय टिप्पणी: होली केवल चेहरे पर रंग मलने का नाम नहीं है, यह मन के पुराने जख्मों को भरने और रिश्तों की नई शुरुआत का अवसर है। इस बार गुलाल के साथ-साथ ‘इंसानियत’ का पक्का रंग भी लगाइए, जो पानी से न छूटे।




