महा-समीक्षा : अंबिकापुर का ‘गुदड़ी चौक कांड’ – लोकतंत्र की हत्या का लाइव टेलीकास्ट या रसूखदारों की गुंडागर्दी?…

अंबिकापुर (सरगुजा)। छत्तीसगढ़ के शांत कहे जाने वाले सरगुजा अंचल में कानून-व्यवस्था की जो तस्वीर उभरी है, उसने प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक इकबाल को कठघरे में खड़ा कर दिया है। अंबिकापुर के हृदय स्थल गुदड़ी चौक पर एक पत्रकार के साथ हुई बर्बरता ने यह सिद्ध कर दिया है कि यहाँ ‘कलम’ पर ‘खादी’ का पहरा बिठाने की कोशिश की जा रही है।

सुनियोजित हमला या सत्ता का नशा? (क्रोनोलॉजी समझिए) – घटना महज एक आकस्मिक विवाद नहीं थी। जब शहर के व्यस्ततम इलाके में राजनीतिक कार्यकर्ता अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहे थे, तब एक पत्रकार का वहां पहुंचना और कैमरा खोलना उन ‘सफेदपोशों’ को नागवार गुजरा।
- कैमरे से एलर्जी : जैसे ही लेंस ने शोर मचाती भीड़ की हकीकत को कैद करना शुरू किया, तथाकथित कार्यकर्ताओं ने ‘सेंसरशिप’ का खूनी रास्ता अपनाया।
- भीड़ का तंत्र : अकेले पत्रकार को घेरकर उसके साथ धक्का-मुक्की की गई। आरोप है कि उसे जातिगत गालियां दी गईं, जो SC-ST एक्ट के तहत एक गंभीर और गैर-जमानती अपराध है।
- वर्दी का मौन : सबसे भयावह दृश्य वह था जब यह सब पुलिस की मौजूदगी में होता रहा। क्या अंबिकापुर पुलिस इतनी लाचार हो चुकी है कि वह अपनी आंखों के सामने एक नागरिक की गरिमा को तार-तार होते देखती रही?
“विधायक को जवाब देना होगा” : लोकतंत्र पर सीधा प्रहार – इस पूरे कांड का ‘न्यूक्लियस’ वह धमकी है जो ऑन-ड्यूटी पुलिस अधिकारी को दी गई। जब हमलावरों ने चिल्लाकर कहा कि “आपको विधायक को जवाब देना होगा”, तो उन्होंने अनजाने में ही सही, उस कड़वे सच को उजागर कर दिया जिसे सिस्टम छिपाने की कोशिश करता है।
विश्लेषण : यह वाक्य केवल एक पुलिस वाले को डराना नहीं था, बल्कि यह संदेश था कि इस जिले में संविधान की धाराएं नहीं, बल्कि ‘माननीय’ की इच्छाएं चलती हैं। यह प्रशासनिक रीढ़ को तोड़ने की एक सोची-समझी कोशिश है।
FIR की खानापूर्ति बनाम गिरफ्तारी का ‘डर’ : कोतवाली पुलिस ने अपराध क्रमांक 0128/2026 तो दर्ज कर लिया। भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की नई धाराओं का मुलम्मा भी चढ़ा दिया गया, लेकिन हकीकत यह है कि एफआईआर के पन्ने अभी भी गिरफ्तारी की स्याही का इंतजार कर रहे हैं।
प्रेस की आजादी पर ‘इमरजेंसी’ जैसे हालात : यह हमला केवल एक व्यक्ति विशेष पर नहीं है। यह उस हर पत्रकार पर हमला है जो फील्ड में जाकर रिपोर्टिंग करता है। अगर आज अंबिकापुर की सड़कों पर एक पत्रकार सुरक्षित नहीं है, तो कल कुसमी, मैनपाट या राजपुर के दूरस्थ अंचलों में सच बोलने वालों का क्या हश्र होगा?
विशेषज्ञों का मत: “जब सत्ता के संरक्षण में पलने वाले तत्व मीडिया को ‘दुश्मन’ समझने लगें, तो समझ लीजिए कि पारदर्शिता का गला घोंटा जा चुका है।”
प्रदेशव्यापी आक्रोश : अब आर-पार की जंग – पत्रकार संगठनों ने अब ‘कलम बंद’ हड़ताल और ‘सड़क पर संग्राम’ का ऐलान कर दिया है। सरगुजा से लेकर राजधानी रायपुर तक इस आग की लपटें पहुँच चुकी हैं।
- चेतावनी: यदि 48 घंटों के भीतर नामजद आरोपियों की सलाखों के पीछे रवानगी नहीं हुई, तो छत्तीसगढ़ का मीडिया जगत प्रदेश स्तरीय चक्काजाम और घेराव को मजबूर होगा।
- मांग: पत्रकारों ने मुख्यमंत्री और गृहमंत्री से सीधे हस्तक्षेप की मांग करते हुए, संबंधित पुलिस अधिकारियों पर भी कार्रवाई की मांग की है जिन्होंने मूकदर्शक की भूमिका निभाई।
निष्कर्ष: अग्निपरीक्षा में प्रशासन : अंबिकापुर की यह घटना छत्तीसगढ़ सरकार के लिए एक ‘लिटमस टेस्ट’ है। क्या सरकार यह संदेश देगी कि कानून सबके लिए बराबर है? या फिर ‘विधायक के रसूख’ के आगे न्याय की बलि चढ़ा दी जाएगी?
सवाल बड़ा है – क्योंकि अगर आज कलम हार गई, तो फिर लोकतंत्र को हारने से कोई नहीं बचा पाएगा।




