बिलासपुर का ‘सफेद सोना’ और रात का खूनी खेल : सेंदरी-घुटकू घाट पर अरपा की नीलामी, सत्ता और शराब के नशे में चूर माफिया का तंत्र…

बिलासपुर। बिलासपुर के जीवनदायिनी अरपा नदी अब केवल रेत माफियाओं के लिए ‘एटीएम’ बनकर रह गई है। यहाँ रात के अंधेरे में जो खेल चल रहा है, वह सिर्फ अवैध उत्खनन नहीं, बल्कि एक संगठित अपराध (Organized Crime) का ऐसा ढांचा है जिसमें खादी, खाकी और शराब कारोबारियों का ‘मौन समर्थन’ शामिल है। सेंदरी और घुटकू घाटों पर भास्कर की टीम ने जब आधी रात को दस्तक दी, तो जो मंजर दिखा वह प्रशासन के गाल पर एक करारा तमाचा है।
मुखबिरी का ‘डिजिटल और नशीला’ साम्राज्य : माफियाओं ने इन घाटों को अभेद्य किले में तब्दील कर दिया है। यहाँ प्रवेश करते ही आपकी निगरानी शुरू हो जाती है।
- 24/7 पेट्रोलिंग : सेंदरी घाट के मुख्य रास्तों और पुलों पर फटे-पुराने कपड़ों में दिखने वाले ये युवक असल में माफिया के ‘हाई-टेक जासूस’ हैं। इनके पास महंगे स्मार्टफोन और पल-पल की अपडेट देने की जिम्मेदारी है।
- शराब की नदियाँ : रात भर जागने के लिए इन गुर्गों को माफिया की ओर से न केवल मोटा पैसा दिया जाता है, बल्कि अवैध शराब का असीमित स्टॉक भी उपलब्ध कराया जाता है। नशे में धुत ये युवक किसी भी बाहरी व्यक्ति, पत्रकार या अधिकारी को डराने-धमकाने से पीछे नहीं हटते।
- कोड वर्ड का इस्तेमाल : जैसे ही कोई संदिग्ध वाहन (जो माफिया की लिस्ट में न हो) घाट की तरफ बढ़ता है, ‘पार्टी आ गई’ या ‘गाड़ी लोड है’ जैसे कोड वर्ड के जरिए मशीनों को शांत कर दिया जाता है।
घुटकू : जहाँ रास्तों को ही रेत का कब्रिस्तान बना दिया गया – घुटकू घाट की स्थिति और भी भयावह है। यहाँ माफिया ने रणनीति के तहत मुख्य रास्तों पर रेत के बड़े-बड़े ढेर खड़े कर दिए हैं।
- इंजीनियर्ड बाधाएं : यह कोई लापरवाही नहीं, बल्कि सोची-समझी साजिश है। अगर खनिज विभाग या पुलिस की टीम छापेमारी के लिए आए, तो उनके वाहन इन ढेरों में फंस जाएं और माफिया को मशीनों समेत भागने का 15-20 मिनट का कीमती समय मिल जाए।
- अंधाधुंध खुदाई : भास्कर की टीम ने देखा कि घुटकू में एक साथ 10-12 ट्रैक्टरों पर रेत लादी जा रही थी। नदी के सीने पर गहरे जख्म (गड्ढे) साफ देखे जा सकते हैं, जो मानसून में जानलेवा साबित होते हैं।
रसूख का सिंडिकेट : सत्ता पक्ष और विपक्ष का ‘मौन गठबंधन’ – हैरानी की बात यह है कि जिले में केवल 4 घाट (अमलडीहा, उदईबंद, सोढ़ाखुर्द, करहीकछार) वैध हैं। फिर 20 से ज्यादा अवैध घाटों से रोज करोड़ों की रेत कैसे निकल रही है?
- राजनीतिक कवच : सूत्रों का कहना है कि रेत के इस अवैध धंधे से निकलने वाला पैसा राजनीतिक रैलियों और चुनावों में ईंधन का काम करता है। इसमें सत्ताधारी दल के दबंगों के साथ-साथ विपक्ष के उन नेताओं की भी हिस्सेदारी है, जिन्हें विरोध न करने की ‘कीमत’ चुकाई जाती है।
- शराब माफिया का प्रवेश : हाल के वर्षों में रेत के धंधे में शराब कारोबारियों की एंट्री ने इसे और हिंसक बना दिया है। परिवहन के लिए इस्तेमाल होने वाले ट्रकों और ट्रैक्टरों का इस्तेमाल कई बार अवैध शराब की तस्करी के लिए भी किए जाने की आशंका है।
सेंदरी पुल : मौत को दावत देता उत्खनन – सेंदरी पुल के ठीक नीचे से ट्रैक्टरों का काफिला गुजरना बेहद चिंताजनक है। पुल के खंभों (Piers) के पास से रेत निकालने के कारण इनकी नींव कमजोर हो रही है। यदि यही स्थिति रही, तो आने वाले समय में बिलासपुर-रतनपुर मार्ग पर स्थित यह महत्वपूर्ण पुल कभी भी धराशायी हो सकता है।
कागजों पर कार्रवाई, जमीन पर सन्नाटा : जब भी कोई बड़ी शिकायत होती है, प्रशासन एकाध ट्रैक्टर जब्त कर अपनी पीठ थपथपा लेता है। लेकिन सेंदरी और घुटकू की जमीनी हकीकत बताती है कि ‘बड़ी मछलियाँ’ आज भी जाल से बाहर हैं। घाटों पर तैनात मजदूरों से लेकर ट्रैक्टर मालिकों तक, सबको पता है कि किसे कितना ‘हिस्सा’ पहुंचाना है।
पड़ताल के कड़वे सवाल :
- कलेक्टर और एसपी के दावों के बावजूद रात 3 बजे घाटों पर मेला कैसे लगा रहता है?
- खनिज विभाग का अमला उन रास्तों पर क्यों नहीं पहुँचता जहाँ रेत के ढेर लगाकर रास्ता रोका गया है?
- सीसीटीवी और ड्रोन से निगरानी के सरकारी वादे क्या सिर्फ फाइलों तक सीमित हैं?




