धरमजयगढ़ का शंखनाद : हाथियों के ‘टापू’ को उजाड़ने की तैयारी, सड़क पर उतरा जनसैलाब…

धरमजयगढ़। जिस जंगल को दुनिया जंगली हाथियों का सुरक्षित ‘टापू’ कहती है, आज वही जंगल विकास की अंधी दौड़ और कोयले की कालिख की भेंट चढ़ने की कगार पर है। धरमजयगढ़ वन मंडल के अस्तित्व को बचाने के लिए आज हजारों आदिवासियों ने हुंकार भरी है। मामला केवल ज़मीन का नहीं, बल्कि आस्था, पर्यावरण और संविधान की मर्यादा का है।
18 कोल ब्लॉक : विनाश की पटकथा? – धरमजयगढ़ की छह रेंजों, विशेषकर छाल और धरमजयगढ़ रेंज में हाथियों का साल भर बसेरा रहता है। लेकिन प्रशासन ने इसी ‘एलीफेंट कॉरिडोर’ में 18 कोल ब्लॉक चिन्हांकित कर दिए हैं।
- नीलाम हो चुके ब्लॉक : अब तक 6 ब्लॉकों (दुर्गापुर-2 तराईमार, सरिया, सेरबन, SECL शाहपुर, इंद्रमणि और अंबुजा-अडानी का पुरुंगा) की नीलामी हो चुकी है।
- कतार में खड़े ब्लॉक : नवागांव ईस्ट-वेस्ट, ओंगना-पोटिया, कोइलार, चैनपुर, रामनगर समेत 12 अन्य ब्लॉक भविष्य के विनाश का इंतज़ार कर रहे हैं।
जंगल की पूजा और विरोध की ललकार : विरोध का स्वर सोमवार को उस वक्त और प्रखर हो गया जब ग्राम नवागांव में ग्रामीणों ने पहले पारंपरिक रीति-रिवाजों से जंगल की पूजा की। आदिवासियों ने हाथियों की सुरक्षा की मन्नत मांगी और फिर हाथों में होर्डिंग लेकर सत्ता के गलियारों तक अपनी आवाज पहुंचाई। ग्रामीणों का सीधा संदेश है- “जब जंगल नहीं बचेगा, तो हम कहाँ बचेंगे?”
पेसा कानून और पांचवीं अनुसूची का ढाल : आंदोलनकारियों ने सरकार को संवैधानिक आईना दिखाते हुए साफ किया है कि यह क्षेत्र पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आता है, जहाँ छत्तीसगढ़ पेसा कानून 2022 प्रभावी है।
“ग्रामसभा की अनुमति के बिना हमारी ज़मीन का एक टुकड़ा भी नीलाम करना असंवैधानिक है। हम अपनी मां समान धरती को कौड़ियों के भाव बिकने नहीं देंगे।” – आंदोलनकारी ग्रामीण
आज 29 दिसंबर : धरमजयगढ़ में ‘जंगी रैली’ – आज सोमवार को धरमजयगढ़ की सड़कें जन-आक्रोश की गवाह बन रही हैं। अमापाली, हाटी, कीदा और नवागांव जैसे दर्जनों गांवों से हजारों की संख्या में आदिवासी महिला-पुरुष स्थानीय क्लब ग्राउंड में एकत्रित हुए हैं।
- कार्यवाही : सभा के बाद एक विशाल रैली नगर में निकाली जा रही है।
- लक्ष्य : एसडीएम कार्यालय पहुंचकर 18 कोल ब्लॉकों को तत्काल निरस्त करने का ज्ञापन सौंपना।
अस्तित्व की लड़ाई : यह लड़ाई अब केवल खनन के विरोध तक सीमित नहीं है। यह धरमजयगढ़ के उस पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) को बचाने की लड़ाई है जो हाथियों और इंसानों के सह-अस्तित्व का प्रतीक रहा है। यदि सरकार ने इन चेतावनियों को अनसुना किया, तो ग्रामीणों का यह ‘शांतिपूर्ण’ संकल्प आने वाले दिनों में एक ‘उग्र’ जन-आंदोलन की शक्ल ले सकता है।




