₹45 लाख का लोन घोटाला, ₹22 लाख की कथित चोरी और पुलिसिया कार्रवाई पर संगीन सवाल!…

- अदालत में ₹22 हजार की कमाई का दावा, बैंक खातों में लाखों का लेन-देन; आठ दिन में चुकाया ₹45 लाख का कर्ज, अब पुलिस चार्जशीट और न्यायालयीन आदेशों ने बढ़ाई मुश्किलें…
रायगढ़। घरघोड़ा थाना क्षेत्र से जुड़ा सीमा बघेल और पिंगल कुमार बघेल का पारिवारिक विवाद अब कई गंभीर कानूनी और प्रशासनिक सवालों के केंद्र में आ गया है। मामला केवल पति-पत्नी के आपसी विवाद तक सीमित नहीं है। इसमें कथित ₹45 लाख की बैंक ऋण धोखाधड़ी, पहचान संबंधी दस्तावेजों के दुरुपयोग, न्यायालय में प्रस्तुत आय संबंधी शपथ-पत्र, बच्चों के भरण-पोषण, महिला कर्मचारियों के उत्पीड़न के आरोप और पुलिस की एकपक्षीय कार्रवाई को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
मीडिया के सामने खुद को प्रताड़ित पति बताने वाले पिंगल कुमार बघेल के दावों पर उनकी पत्नी सीमा बघेल ने दस्तावेजों और न्यायालयीन आदेशों के आधार पर पलटवार किया है। सीमा का दावा है कि उनके पति ने वास्तविक आर्थिक स्थिति छिपाकर न्यायालय को गुमराह करने का प्रयास किया और अपने विरुद्ध उठे गंभीर वित्तीय आरोपों से ध्यान भटकाने के लिए उन पर चोरी जैसे आरोप लगाए।
सीमा बघेल ने दो न्यायालयों के आदेशों, बैंकिंग दस्तावेजों और पुलिस कार्रवाई से संबंधित अभिलेखों का हवाला देते हुए निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार पुलिसकर्मियों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की है।
₹22.63 लाख की चोरी का आरोप, आखिर उस रकम का स्रोत क्या था? – सीमा बघेल के मुताबिक, पिंगल बघेल ने मीडिया और कानूनी कार्यवाही में आरोप लगाया कि उन्होंने वर्ष 2010 से 2022 के बीच वैवाहिक घर की अलमारी से ₹22,63,428 की नकदी चोरी की।
सीमा ने इस आरोप को पूरी तरह निराधार बताते हुए कई सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि जब दोनों पति-पत्नी एक ही वैवाहिक घर में रह रहे थे, तब कथित रूप से इतनी बड़ी नकदी घर में रखे जाने का आधार क्या था? उस रकम का वैध स्रोत क्या था? क्या इस राशि का कोई बैंकिंग रिकॉर्ड, आयकर विवरण अथवा अन्य वित्तीय दस्तावेज उपलब्ध है?
सीमा का तर्क है कि यदि वास्तव में इतनी बड़ी नकदी घर में मौजूद थी, तो उसके स्रोत और स्वामित्व की जांच भी उतनी ही गंभीरता से होनी चाहिए।
यह मामला अब एक और महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करता है – क्या चोरी के आरोपों की जांच के साथ कथित नकदी के स्रोत की भी निष्पक्ष पड़ताल हुई?
अदालत में ₹22 हजार मासिक आय का दावा, लेकिन बैंकिंग दस्तावेजों में सामने आए दूसरे वित्तीय संकेत – मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू पिंगल बघेल द्वारा न्यायालय में प्रस्तुत आय संबंधी शपथ-पत्र है।
सीमा बघेल के अनुसार, पिंगल ने न्यायालय में स्वयं को मात्र ₹22,000 प्रतिमाह कमाने वाला वेल्डिंग मजदूर बताया था। लेकिन सीमा ने इसके विपरीत बैंकिंग दस्तावेज प्रस्तुत करते हुए दावा किया कि उसके व्यावसायिक खातों में ₹9.50 लाख की कैश क्रेडिट (CC) सीमा संचालित है।
इसके अतिरिक्त, सीमा का आरोप है कि पिंगल बघेल एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक को प्रतिमाह लगभग ₹50,000 की कार ऋण किस्त चुका रहा था।
ऐसे में सवाल स्वाभाविक है—यदि मासिक आय महज ₹22 हजार है, तो ₹50 हजार की कार ईएमआई और व्यावसायिक वित्तीय गतिविधियों का संचालन किस आय से हो रहा था?
सीमा ने इन तथ्यों को न्यायालय के समक्ष आय संबंधी शपथ-पत्र में कथित विसंगतियों का आधार बनाया है। उनका कहना है कि न्यायालय को वास्तविक आर्थिक स्थिति से अवगत कराने और झूठे शपथ-पत्र के संबंध में दंडात्मक कार्यवाही के लिए धारा 340 CrPC के अंतर्गत आवेदन की प्रक्रिया शुरू की गई है।
बच्चों की स्कूल फीस तक जमा नहीं होने का न्यायालयीन रिकॉर्ड में उल्लेख! – पिंगल बघेल द्वारा अपने दोनों नाबालिग बच्चों के पालन-पोषण और शिक्षा की जिम्मेदारी उठाने के दावे पर भी सीमा बघेल ने सवाल उठाए हैं।
उनके अनुसार, धरमजयगढ़ के अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश न्यायालय के 23 सितंबर 2026 के आदेश में बच्चों की स्कूल फीस जमा नहीं होने से संबंधित तथ्य दर्ज हैं। सीमा का दावा है कि न्यायालयीन कार्यवाही के दौरान पिंगल के अधिवक्ता ने भी इस संबंध में स्थिति स्वीकार की थी।
यदि न्यायालयीन आदेश में दर्ज इन तथ्यों की पुष्टि होती है, तो यह उस दावे से बिल्कुल अलग तस्वीर प्रस्तुत करता है जिसमें बच्चों की पूरी जिम्मेदारी उठाने की बात कही जा रही है।
यहां सबसे बड़ा सवाल बच्चों के भविष्य का है। पति-पत्नी के विवाद में आखिर उन मासूम बच्चों की शिक्षा और भरण-पोषण की जिम्मेदारी कौन उठाएगा?
महिला कर्मचारियों के उत्पीड़न और अनैतिक संबंधों के भी गंभीर आरोप – सीमा बघेल ने पिंगल बघेल के निजी एवं कार्यालयीन आचरण को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए हैं।
उनका आरोप है कि पिंगल के दूसरी विवाहित महिला रनिभा शांडिल्य के साथ कथित अनुचित संबंध थे। इसके अलावा, उन्होंने कार्यालय की महिला कर्मचारी कुमारी आरती निर्मलकर को शारीरिक संबंध बनाने के लिए कथित रूप से दबाव डालने और प्रताड़ित करने का आरोप भी लगाया है।
सीमा का कहना है कि जब उन्होंने इन गतिविधियों का विरोध किया, तो उनके साथ मारपीट और घरेलू हिंसा की गई।
हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र जांच और संबंधित पक्षों का आधिकारिक पक्ष सामने आना आवश्यक है। महिला कर्मचारियों से जुड़े आरोपों की गंभीरता को देखते हुए निष्पक्ष जांच की मांग भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
₹45 लाख का लोन, कथित जाली हस्ताक्षर और आठ दिन में पूरा भुगतान! – इस पूरे प्रकरण का सबसे गंभीर वित्तीय पहलू कथित ₹45 लाख की ऋण धोखाधड़ी है।
सीमा बघेल का आरोप है कि उनके पैन कार्ड और आधार कार्ड का दुरुपयोग कर कथित रूप से जाली हस्ताक्षरों के माध्यम से बैंक से ₹45,00,000 का ऋण प्राप्त किया गया।
सीमा के अनुसार, इस संबंध में पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई थी। शिकायत दर्ज होने के महज आठ दिनों के भीतर पिंगल बघेल ने संबंधित बैंक का पूरा ऋण चुका दिया।
सीमा का दावा है कि पिंगल ने न्यायालयीन कार्यवाही में भी ऋण चुकाने की बात स्वीकार की है।
अब इस घटनाक्रम से कई महत्वपूर्ण सवाल उठते हैं –
- यदि ऋण लेने में किसी अन्य व्यक्ति के पहचान दस्तावेजों और हस्ताक्षरों का दुरुपयोग हुआ था, तो उसकी जांच किस स्तर तक पहुंची?
- ऋण की राशि किस खाते में गई और उसका वास्तविक उपयोग किसने किया?
- शिकायत के बाद आठ दिनों के भीतर ₹45 लाख की अदायगी के लिए धनराशि का स्रोत क्या था?
- क्या बैंक और पुलिस ने इस पूरे वित्तीय लेन-देन की स्वतंत्र जांच की?
सीमा का आरोप है कि इस मामले में उनके द्वारा उठाए गए सवालों को शुरुआती स्तर पर अपेक्षित गंभीरता से नहीं लिया गया। हालांकि, पुलिस के आरोप-पत्र और न्यायालयीन रिकॉर्ड में दर्ज वास्तविक तथ्यों का परीक्षण करना आवश्यक है।
घरघोड़ा पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल, क्या एक पक्ष की शिकायत पर हुई जल्दबाजी? – इस प्रकरण में सीमा बघेल ने घरघोड़ा थाने की तत्कालीन कार्रवाई पर सबसे गंभीर सवाल उठाए हैं।
उनका आरोप है कि ₹45 लाख के कथित ऋण फर्जीवाड़े और पहचान संबंधी दस्तावेजों के दुरुपयोग की शिकायत के बावजूद पुलिस ने अपेक्षित कार्रवाई नहीं की, जबकि उनके विरुद्ध ₹22,63,428 की कथित चोरी के आरोप में तेजी से कार्रवाई की गई।
सीमा के मुताबिक, उन्हें और उनके भाई को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया है कि गिरफ्तारी और जांच की प्रक्रिया में आवश्यक कानूनी प्रावधानों का पालन नहीं किया गया तथा महिला पुलिस अधिकारी की उपस्थिति से संबंधित प्रक्रियात्मक सवाल भी उठते हैं।
इतना ही नहीं, सीमा ने केस डायरी में कथित रूप से गलत बयान दर्ज करने और 15 वर्षीय नाबालिग बच्ची के नाम से कथित गवाही तैयार किए जाने का आरोप भी लगाया है।
ये आरोप सीधे तौर पर पुलिस की निष्पक्षता और विवेचना की विश्वसनीयता से जुड़े हैं। यदि इनमें तथ्यात्मक आधार है, तो इसकी स्वतंत्र विभागीय और कानूनी जांच आवश्यक है।
DGP और गृह सचिव तक पहुंचा मामला, पुलिसकर्मियों के विरुद्ध अभियोजन स्वीकृति की मांग – सीमा बघेल ने पुलिस कार्रवाई में कथित अनियमितताओं को लेकर राज्य के पुलिस महानिदेशक, रायपुर तथा छत्तीसगढ़ शासन के गृह सचिव के समक्ष लिखित आवेदन भेजने की जानकारी दी है।
उनके अनुसार, संबंधित पुलिसकर्मियों के विरुद्ध आपराधिक अभियोजन की अनुमति और आवश्यक विभागीय कार्रवाई की मांग की गई है।
सीमा ने आरोप लगाया है कि विवेचना के दौरान कुछ पुलिसकर्मियों ने पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया और उनके परिवार को प्रताड़ित किया।
उनकी मांग है कि पूरे मामले की जांच स्थानीय स्तर से अलग किसी निष्पक्ष सक्षम एजेंसी अथवा वरिष्ठ अधिकारी की निगरानी में कराई जाए, ताकि शिकायतकर्ता और आरोपी दोनों पक्षों के आरोपों की निष्पक्ष पड़ताल हो सके।
₹45 लाख के मामले में पुलिस ने दाखिल किया आरोप-पत्र, अब न्यायालय में होगी आगे की सुनवाई – इस पूरे विवाद में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम एफआईआर क्रमांक 138/2026 से जुड़ा है।
सीमा बघेल के अनुसार, ₹45 लाख के कथित ऋण धोखाधड़ी प्रकरण में पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धाराओं के तहत आरोप-पत्र सक्षम न्यायालय में प्रस्तुत कर दिया है।
यदि आरोप-पत्र दाखिल होने की पुष्टि न्यायालयीन अभिलेख से होती है, तो इसका अर्थ है कि पुलिस विवेचना के बाद मामला अब न्यायिक परीक्षण के चरण में पहुंच चुका है।
हालांकि, आरोप-पत्र दाखिल होना दोषसिद्धि नहीं है। मामले में अंतिम निर्णय साक्ष्यों और न्यायालयीन परीक्षण के बाद ही होगा।
दो न्यायालयों से भरण-पोषण के आदेश, ₹2.10 लाख बकाया और दुकानों-वाहनों की कुर्की की मांग – सीमा बघेल के अनुसार, भरण-पोषण के मामले में भी उन्हें न्यायालय से महत्वपूर्ण राहत मिली है।
उनका दावा है कि अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश न्यायालय ने ₹30,000 प्रतिमाह अंतरिम भरण-पोषण निर्धारित किया है। इसके साथ ही ₹2,10,000 की बकाया राशि 30 दिनों के भीतर जमा करने का आदेश दिया गया है।
इसके अतिरिक्त, घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 23 के अंतर्गत न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी के न्यायालय से ₹10,000 प्रतिमाह अतिरिक्त अंतरिम राहत का आदेश भी प्राप्त होने की जानकारी दी गई है।
सीमा का आरोप है कि आदेशों के बावजूद निर्धारित राशि नियमित रूप से जमा नहीं की जा रही है।
उन्होंने बताया कि 28 अक्टूबर 2026 को न्यायालय में पिंगल बघेल के व्यावसायिक प्रतिष्ठानों ‘प्रकाश फैब्रिकेशन’ और ‘बघेल सेंट्रिंग’ तथा उनके नाम दर्ज वाहनों के विरुद्ध कुर्की और जब्ती की कार्रवाई की मांग को लेकर कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई है।
यदि न्यायालय द्वारा जारी आदेशों का पालन नहीं किया जाता है, तो संबंधित कानून के अंतर्गत वसूली और प्रवर्तन की कार्रवाई का रास्ता खुला रहता है।
अब एसएसपी रायगढ़ से उम्मीद : पुलिस कार्रवाई के दोनों पक्षों की हो निष्पक्ष जांच – सीमा बघेल ने रायगढ़ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक शशि मोहन सिंह से पूरे प्रकरण में हस्तक्षेप कर निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने की अपील की है।
उनका कहना है कि किसी भी महिला को पारिवारिक विवाद की आड़ में झूठे आरोपों और कथित पुलिसिया प्रताड़ना का सामना नहीं करना पड़े। साथ ही, यदि किसी पुलिसकर्मी ने अपने पद और अधिकारों का दुरुपयोग किया है, तो उसके विरुद्ध भी कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
सीमा की मांग है कि ₹45 लाख के कथित ऋण फर्जीवाड़े, ₹22.63 लाख की कथित चोरी, गिरफ्तारी की परिस्थितियों, केस डायरी में दर्ज बयानों और न्यायालय में प्रस्तुत वित्तीय दस्तावेजों की निष्पक्ष समीक्षा की जाए।
अब निगाहें पुलिस प्रशासन पर हैं कि वह इन गंभीर आरोपों पर क्या आधिकारिक रुख अपनाता है और क्या पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाती है।
वरिष्ठ अधिवक्ता तथागत श्रीवास्तव का पक्ष : पुलिस कार्रवाई का दूसरा पहलू भी समाज के सामने आना चाहिए – सीमा बघेल और जानकी सिदार प्रकरण की पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता तथागत श्रीवास्तव का कहना है कि पुलिस की कार्रवाई में अक्सर घटना का एक पक्ष ही सार्वजनिक हो पाता है, जबकि दूसरा पक्ष न्यायिक प्रक्रिया या मीडिया के माध्यम से सामने आता है।
उनके अनुसार, अधिवक्ता और पत्रकार पुलिस अथवा प्रशासन के विरोधी नहीं होते। उनका दायित्व यह सुनिश्चित करने का प्रयास करना है कि कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई सही दिशा में आगे बढ़े तथा आम नागरिकों का कानून व्यवस्था पर विश्वास बना रहे।
अधिवक्ता श्रीवास्तव ने कहा कि सीमा बघेल के प्रकरण में न्यायालय से उन्हें अंतरिम भरण-पोषण के रूप में ₹30,000 प्रतिमाह की राहत मिली है। उनके अनुसार, न्यायालयीन कार्यवाही में पीड़िता को महत्वपूर्ण राहत प्राप्त हुई है।
उन्होंने जानकी सिदार प्रकरण का उल्लेख करते हुए बताया कि वहां भी एक पुलिसकर्मी के कथित पूर्वाग्रहपूर्ण आचरण के विरुद्ध वरिष्ठ विभागीय अधिकारियों और आयोग के समक्ष लिखित शिकायत प्रस्तुत की गई है तथा न्यायिक प्रक्रिया शुरू की गई है।
उनका कहना है कि दोनों मामलों में कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से वास्तविक तथ्यों को सामने लाने का प्रयास जारी है।
अब सबसे बड़ा सवाल : कानून का तराजू दोनों पक्षों के लिए बराबर कब? – ₹45 लाख का कथित ऋण फर्जीवाड़ा, ₹22.63 लाख की कथित चोरी, आय संबंधी शपथ-पत्र में विसंगतियों के आरोप, बच्चों के भरण-पोषण के आदेश और पुलिस विवेचना पर उठते सवाल—ये सभी घटनाक्रम एक गंभीर कानूनी विवाद की ओर संकेत करते हैं।
इस पूरे प्रकरण में केवल आरोप लगाने या किसी एक पक्ष की कहानी को अंतिम सच मान लेने से न्याय नहीं होगा। आवश्यकता है कि बैंकिंग रिकॉर्ड, न्यायालयीन आदेश, पुलिस केस डायरी, गिरफ्तारी की प्रक्रिया और संबंधित व्यक्तियों के बयान स्वतंत्र रूप से परखे जाएं।
सीमा बघेल की लड़ाई अब केवल वैवाहिक विवाद की नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच, न्यायिक आदेशों के पालन और पुलिस जवाबदेही के सवाल से भी जुड़ चुकी है। अब देखना यह है कि रायगढ़ पुलिस प्रशासन इन सवालों का जवाब दस्तावेजों और कार्रवाई से देता है या यह मामला भी लंबी कानूनी प्रक्रिया में उलझकर रह जाता है।




