मेकाहारा की बदहाली पर स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल से तीखे सवाल: एक बेड पर दो-दो प्रसूताएं और फर्श पर नवजात… क्या यही है स्वास्थ्य व्यवस्था का ‘सुशासन’?…

रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल पं. जवाहरलाल नेहरू स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय से संबद्ध डॉ. भीमराव आंबेडकर स्मृति चिकित्सालय (मेकाहारा) से सामने आई तस्वीरें स्वास्थ्य महकमे के दावों की धज्जियां उड़ाने के लिए काफी हैं। मंचों से स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार और ‘सर्वोत्तम इलाज’ के लंबे-चौड़े दावे करने वाले प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल के दावों की पोल मेकाहारा के प्रसूति वार्ड (लेबर/मेटर्निट वार्ड) की इन बेबस तस्वीरों ने खोलकर रख दी है।
वीडियो की जमीनी हकीकत: दर्द, बेबसी और बदइंतजामी – सामने आए वीडियो में जो मंजर नजर आ रहा है, वह किसी भी संवेदनशील इंसान को झकझोर देने वाला है:
- एक संकरे बेड पर दो-दो प्रसूताएं और नवजात शिशु : डिलीवरी के बाद जहां प्रसूता को शांत वातावरण, संक्रमण-मुक्त कमरा और संपूर्ण आराम चाहिए, वहां एक ही सिंगल बेड पर दो-दो प्रसूताओं को उनके नवजात बच्चों के साथ ठूंस दिया गया है। महिलाएं करवट तक नहीं ले पा रही हैं और नवजात बच्चे बिस्तरों के बीच सिकुड़े पड़े हैं।
- जमीन पर सोने को मजबूर माताएं और तीमारदार : बेड की भारी कमी के चलते हाल ही में प्रसव पीड़ा झेल चुकी महिलाएं और उनके परिजन वार्ड के फर्श पर गद्दे या चादर बिछाकर लेटने को मजबूर हैं। अस्पताल प्रशासन के पास इन माताओं के लिए एक अदद बिस्तर तक उपलब्ध नहीं है।
- संक्रमण (Infection) का खुला न्योता : नवजात बच्चों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बेहद कमजोर होती है। एक ही बेड पर दो माताओं और दो नवजातों का रहना क्रॉस-इन्फेक्शन (Cross-infection) के खतरे को सीधे दावत दे रहा है। अगर किसी एक मरीज को संक्रमण फैलता है, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल के दावों पर सीधा प्रहार – स्वास्थ्य मंत्री जी, निरीक्षणों और बैठकों की रस्म अदायगी से कब बाहर निकलेंगे? जब राजधानी रायपुर के दिल में स्थित प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल का यह आलम है, तो दूर-दराज के आदिवासी अंचलों (बस्तर, सरगुजा) के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की स्थिति का अंदाजा लगाना भी मुश्किल नहीं है।
- कागजी समीक्षाएं बनाम जमीनी सच्चाई : स्वास्थ्य मंत्री लगातार विभागीय बैठकों में स्वास्थ्य अधोसंरचना को मजबूत करने की बातें करते हैं, लेकिन सवाल उठता है कि राजधानी के मेकाहारा में बेड क्षमता का विस्तार क्यों नहीं हुआ? क्या प्रसूताओं को सम्मानजनक मातृत्व सुविधा देना सरकार की प्राथमिकता सूची में नहीं है?
- वीआईपी और आम जनता में दोहरा मापदंड : यही सवाल सबसे तीखा है कि अगर किसी माननीय मंत्री, नेता या रसूखदार अधिकारी के परिवार में प्रसव होता, तो क्या वे अपने नवजात को ऐसे भीड़भाड़ वाले बेड या फर्श पर लिटाते? आम जनता के हिस्से में ही यह दुर्दशा क्यों आती है?
जनता के 5 सीधे सवाल स्वास्थ्य मंत्री से :
- बजट और फंड कहां जा रहा है? करोड़ों रुपये के स्वास्थ्य बजट के बावजूद मेकाहारा जैसे शीर्ष अस्पताल में अतिरिक्त बेड और आवश्यक सुविधाओं का अभाव क्यों बना हुआ है?
- संक्रमण और नवजात मृत्यु के जोखिम का जिम्मेदार कौन? प्रसूति वार्ड में ऐसी अव्यवस्था से अगर किसी नवजात की जान पर बन आती है, तो क्या स्वास्थ्य विभाग इसकी सीधी जिम्मेदारी लेगा?
- रेफरल लोड का प्रबंधन क्यों नहीं? जिलों के अस्पतालों को इतना सक्षम क्यों नहीं बनाया गया कि सभी मरीजों को रायपुर रेफर न होना पड़े, जिससे मेकाहारा पर यह अत्यधिक दबाव कम हो सके?
- कागजी निरीक्षणों का क्या नतीजा निकला? बड़े-बड़े दौरों और फोटो-अप्स के बाद भी मेकाहारा के वार्डों की सूरत जस की तस क्यों है?
- जवाबदेही कब तय होगी? अस्पताल प्रबंधन और जिम्मेदार अधिकारियों पर ऐसी अमानवीय परिस्थितियों के लिए अब तक क्या कार्रवाई की गई?
भाषणों से नहीं, बिस्तरों और व्यवस्था से सुधरेगा स्वास्थ्य – मेकाहारा की यह बदहाली चीख-चीख कर कह रही है कि स्वास्थ्य महकमा केवल बयानों और दौरों से नहीं चलता। स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल को केवल फाइलों पर नहीं, बल्कि अस्पताल के इन वार्डों में पहुंचकर उन माताओं की आंखों में देखना चाहिए, जो अपने नवजात को सीने से लगाकर एक अदद बेड के लिए गिड़गिड़ा रही हैं। जनता अब कोरे आश्वासनों से संतुष्ट नहीं होगी, उसे व्यवस्था में ठोस और तत्काल सुधार चाहिए।




