रायगढ़ फाइल्स : ‘गोंड राजा’ बेघर, आदिवासी सांसद लाचार; बागी रवि भगत के एक खत से भाजपा के नए ‘पावर सेंटर’ पर सीधा हमला…

रायगढ़। रायगढ़ की शांत दिखती सियासत के भीतर जो असंतोष सुलग रहा था, वह लैलूंगा एसडीएम के दफ्तर से निकली एक चिट्ठी के साथ ज्वालामुखी बनकर फट पड़ा है। ऊपर से देखने में यह पत्र रायगढ़ के तीन माननीयों के लिए प्रशासनिक अमले से दफ्तर और आवास मांगने की एक औपचारिक दरखास्त नजर आता है, लेकिन असल में यह सत्ता के नए निजाम के खिलाफ बगावत का खुला घोषणापत्र है।

इस एक खत ने साफ कर दिया है कि जिले में कागजों पर भले ही आदिवासी नेतृत्व का परचम लहरा रहा हो, लेकिन जमीन पर सियासत का नया व्याकरण लिखा जा चुका है।
दिल्ली में प्रोटोकॉल, अपने ही गृह जिले में ‘बेघर’ जनप्रतिनिधि – देश की संसद में बैठकर कानून बनाने वाले दो बड़े चेहरे आज अपने ही गृह जिले में एक अदद सरकारी छत के लिए तरस रहे हैं:
- राधेश्याम राठिया (लोकसभा सांसद): रायगढ़ के सबसे बड़े सामाजिक धड़े और घरघोड़ा से आने वाले जनादेश प्राप्त सांसद।
- देवेंद्र प्रताप सिंह (राज्यसभा सांसद): रायगढ़ रियासत के ‘गोंड राजा’, जिनके पुरखों के नाम पर सरकारें बड़े-बड़े जलसे करती हैं।
विडंबना यह है कि प्रोटोकॉल के भारी लवाजमे के बीच चलने वाले इन दोनों सांसदों के पास रायगढ़ जिला मुख्यालय में कार्यकर्ताओं से मिलने या जनता की समस्याएं सुनने के लिए कोई आधिकारिक कार्यालय तक नहीं है। सवाल उठना लाजिमी है कि क्या जिला प्रशासन इन दिग्गजों के कद से अनजान है, या फिर किसी अघोषित ‘पावर सेंटर’ के खौफ ने स्थानीय अफसरों की कलम थाम रखी है?
ऐतिहासिक ‘सांसद बंगले’ पर कब्जा: बदल गया रायगढ़ का सियासी पता – रायगढ़ मुख्यालय का वह ‘सांसद बंगला’ जो पिछले दो दशकों से सत्ता और आदिवासी राजनीति की धुरी रहा, आज अपनी पहचान बदल चुका है:
- इतिहास: इसी बंगले से मौजूदा मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने लगातार चार बार अपनी सांसदी चलाई। केंद्र में मंत्री रहते हुए भी यह उनका गढ़ रहा और बाद में पूर्व सांसद गोमती साय का आधिकारिक ठिकाना बना।
- वर्तमान: अब उस बंगले से ‘सांसद’ की तख्ती हटा दी गई है। यह ऐतिहासिक आवास अब रायगढ़ विधायक और प्रदेश के वित्त मंत्री ओ.पी. चौधरी को आवंटित हो चुका है।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक संदेश बिल्कुल साफ है—जिले की सरपरस्ती अब सांसदों के पास नहीं, बल्कि नए निजाम के हाथों में है। दिल्ली में चाहे जो ओहदा हो, रायगढ़ की चौखट पर आते ही सांसदों की हैसियत महकमे के भीतर ‘मेहमान’ जैसी बना दी गई है।
बागी रवि भगत का तीर : जख्म पर सलीके से रगड़ा नमक – इस पूरे सियासी ड्रामे का सबसे धारदार पहलू है अर्जी लगाने वाले का नाम—रवि भगत। भाजयुमो के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रहे रवि भगत वही शख्स हैं, जिन्होंने कुछ समय पहले सड़क और मूलभूत मुद्दों को लेकर सीधे वित्त मंत्री की कार्यशैली के खिलाफ मोर्चा खोला था। नतीजा यह हुआ कि हफ्ता भर बीतते-बीतते उन्हें संगठन से बेदखल कर दिया गया।
अब बागी हो चुके रवि भगत ने लैलूंगा एसडीएम के जरिए सांसदों के लिए आवास मांगकर भाजपा की उस दुखती रग पर हाथ रख दिया है, जिसे पार्टी संगठन लंबे समय से दबाने की कोशिश कर रहा था। यह कोई प्रशासनिक गुहार नहीं, बल्कि एक सुनियोजित राजनीतिक तंज है:
- पार्टी के जमीनी और पारंपरिक आदिवासी आधार को यह अहसास कराना कि वे हाशिए पर हैं।
- नौकरशाही और नए पावर हाउस के गठबंधन को सार्वजनिक रूप से कटघरे में खड़ा करना।
- यह सवाल उछालना कि जब रियासत के वारिस और चुने हुए सांसद ही बेबस हैं, तो आम कार्यकर्ता की बिसात क्या है?
सड़क पर स्वाभिमान या नुक्कड़ पर जनसुनवाई? – जिले में अब सुगबुगाहट तेज है कि जब तक सत्ता का शीर्ष नेतृत्व इस आंतरिक असंतोष का संज्ञान नहीं लेता, तब तक रायगढ़ के ये जनप्रतिनिधि अपनी जनसुनवाई के लिए किसी विश्राम गृह, चाय की दुकान या स्टेशन के प्रतीक्षालय का ही सहारा लेने को मजबूर रहेंगे।
रवि भगत के इस खत ने अफसरों की निष्पक्षता और सरकार के भीतर ‘आदिवासी स्वाभिमान’ के दावों की असलियत दोनों को चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है। रायगढ़ भाजपा का यह अंतर्कलह अब बंद कमरों से निकलकर प्रशासनिक फाइलों और जनता की जुबान तक पहुंच चुका है।




