6 आदेश, कारण बताओ नोटिस और वेतन रोकने का फरमान बेअसर! क्या रायगढ़ में ‘खास मंत्री’ की छत्रछाया में पल रहे हैं नियम-कानून?…

- मंत्रालय से लेकर विकास आयुक्त कार्यालय तक के फरमानों को रायगढ़ जिला पंचायत में दिखाया गया ठेंगा; 2.5 साल से ट्रांसफर के बावजूद जमे हैं अतिरिक्त सीईओ नीलाराम पटेल…
विशेष रिपोर्ट। रायगढ़। प्रशासनिक इकबाल का इससे बड़ा मजाक और क्या हो सकता है कि प्रदेश की राजधानी स्थित मंत्रालय से एक अधिकारी के तबादले के 6 अलग-अलग आदेश, रिमाइंडर, कारण बताओ नोटिस और वेतन रोकने के स्पष्ट निर्देश जारी हो जाते हैं, लेकिन जिला मुख्यालय में बैठा अफसर टस से मस नहीं होता।
छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिला पंचायत में पदस्थ अतिरिक्त मुख्य कार्यपालन अधिकारी (अतिरिक्त सीईओ) नीलाराम पटेल का यह मामला अब राज्य प्रशासनिक व्यवस्था के साथ-साथ राजनीतिक गलियारों में भी तीखे सवालों का सबब बन गया है। शासन के आदेशों की इस कदर धज्जियां उड़ाए जाने के बाद अब खुलकर चर्चाएं हो रही हैं कि क्या अफसर को जिले के किसी ‘ताकतवर मंत्री’ की छत्रछाया हासिल है?
कागजों पर घूमते रहे आदेश, कुर्सी पर डटे रहे साहब : उपलब्ध दस्तावेजों और प्रशासनिक रिकॉर्ड्स के मुताबिक मामला किसी सामान्य देरी का नहीं, बल्कि सीधे तौर पर शासन के आदेशों की नाफरमानी का है:
- 12 मार्च 2024: पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग द्वारा नीलाराम पटेल का स्थानांतरण जिला पंचायत रायगढ़ से सुदूर बीजापुर कर दिया गया।
- 29 अक्टूबर 2024: तबादले पर अमल न होने पर शासन ने ‘तत्काल कार्यमुक्त’ करने का कड़ा निर्देश दिया।
- 27 नवंबर 2024: रिमाइंडर पत्र जारी किया गया।
- 20 जनवरी 2025: विकास आयुक्त कार्यालय द्वारा एकतरफा जॉइनिंग के आदेश जारी हुए।
- 18 सितंबर 2025: लगातार आदेशों की अवहेलना पर कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notice) थमाया गया।
- 26 नवंबर 2025: पुनः पत्राचार कर नियम पालन के निर्देश दिए गए।
- जनवरी 2026: सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) के स्पष्ट आदेश के बावजूद कि मूल पद पर अवैध रूप से जमे अफसरों का वेतन न निकाला जाए, संबंधित अधिकारी की तनख्वाह बिना रोक-टोक जारी रही।
बड़ा सवाल : अगर यही गलती किसी निचले पायदान के तृतीय या चतुर्थ वर्ग कर्मचारी ने की होती, तो क्या अब तक उसे निलंबित कर विभागीय जांच बैठा नहीं दी गई होती?
2014 से ‘रायगढ़ मोह’: गृह ब्लॉक के निवासी, फिर भी संपन्न कराए बड़े चुनाव – मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि वर्ष 2014 में शासकीय सेवा में आने के बाद से नीलाराम पटेल का लगभग पूरा सेवाकाल रायगढ़ जिले के इर्द-गिर्द ही बीता है। डभरा में जनपद सीईओ के रूप में महज एक साल के कार्यकाल को छोड़ दें, तो वे पुसौर, बरमकेला से लेकर रायगढ़ के विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर काबिज रहे।
वे खुद रायगढ़ विकासखंड की एक ग्राम पंचायत के मूल निवासी बताए जाते हैं। इसके बावजूद, स्थानीय निवासी होने के नियमों को दरकिनार कर उनके कार्यकाल में विधानसभा, लोकसभा और पंचायत चुनाव जैसे निष्पक्षता-मांगने वाले बड़े निर्वाचन संपन्न कराए गए।
निशाने पर ‘माननीय’ और तत्कालीन सीईओ की भूमिका – रायगढ़ जिला वित्त एवं वाणिज्यिक कर मंत्री ओपी चौधरी का राजनीतिक गढ़ है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि जिस जिले में शासन के आदेशों को ढाई साल से धूल चटाई जा रही हो, वहां स्थानीय जनप्रतिनिधि और जिम्मेदार मौन क्यों साधे रहे?
आरोप है कि तत्कालीन जिला पंचायत सीईओ से लेकर बाद में आए अधिकारियों ने फाइल को ठंडे बस्ते में डाले रखा। यही वजह है कि विपक्षी खेमा और स्थानीय लोग अब सीधे तौर पर प्रशासनिक-राजनीतिक सांठगांठ का आरोप लगा रहे हैं।
जिम्मेदार बोले – ‘सत्र के बाद करेंगे कार्रवाई’
“आदेश तो जारी किया गया था। स्थानांतरण की प्रक्रिया किस वजह से पूरी नहीं हो सकी, इसकी जांच की जाएगी। विधानसभा सत्र समाप्त होते ही इस मामले में उचित कार्रवाई की जाएगी।”
वी.पी. तिर्की, अपर विकास आयुक्त, पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग, रायपुर
“तबादला तो हुआ था, लेकिन वर्तमान स्थिति की मुझे जानकारी नहीं है। यह मेरे प्रभार ग्रहण करने से पहले का मामला है, रिकॉर्ड देखकर ही कुछ कह पाऊंगा।”
अभिजीत पठारे, सीईओ, जिला पंचायत रायगढ़
नजरें अब शासन के ‘इकबाल’ पर – क्या यह मामला भी अन्य फाइलों की तरह सरकारी अलमारियों में दफन हो जाएगा, या फिर राज्य शासन इस खुली नाफरमानी पर सख्त कदम उठाते हुए जवाबदेही तय करेगा? रायगढ़ की जनता और प्रशासनिक महकमा अब इसी जवाब के इंतजार में है।




