अंबिकापुर

विशेष रिपोर्ट : सरगुजा के 85 गाँवों का ‘ग्रीन रिवोल्यूशन’, जहाँ मुट्ठी भर अनाज से बच रहे हैं जंगल…

सरगुजा। प्रकृति और मनुष्य के बीच के टूटते रिश्तों को जोड़ने की एक अद्भुत मिसाल छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले से सामने आई है। यहाँ के लुण्ड्रा ब्लॉक में स्थित 85 गाँवों ने यह साबित कर दिया है कि अगर समाज ठान ले, तो बिना किसी भारी सरकारी तामझाम के भी जंगलों को पुनर्जीवित किया जा सकता है। लुण्ड्रा का यह ‘सामुदायिक मॉडल’ आज देश भर के पर्यावरणविदों के लिए चर्चा का विषय बन गया है।

अनोखा ‘अनाज बैंक’ : सुरक्षा का सामाजिक मॉडल – इस पूरे अभियान की रीढ़ है यहाँ की पारंपरिक विनिमय व्यवस्था। ग्रामीणों ने तय किया है कि जंगल की रखवाली करने वाले प्रहरियों का पेट पूरा गाँव मिलकर भरेगा।

  • संग्रहण : हर घर से हर महीने एक किलो चावल या स्वेच्छा से अन्य अनाज (गेहूं, महुआ, जवा) इकट्ठा किया जाता है।
  • मानदेय : यह अनाज उन ग्रामीणों या चौकीदारों को दिया जाता है जो बारी-बारी से जंगल की निगरानी करते हैं।
  • परिणाम : इस व्यवस्था ने जंगल की सुरक्षा को ‘सरकारी ड्यूटी’ से हटाकर ‘सामुदायिक जिम्मेदारी’ बना दिया है। अब जंगल की एक लकड़ी काटना भी पूरे गाँव के अपमान के बराबर माना जाता है।

‘अधिकार पत्र’ से बढ़ा ग्रामीणों का रसूख – सालों तक वन विभाग और ग्रामीणों के बीच खींचतान चलती रही, लेकिन सामुदायिक वन प्रबंधन अधिकार पत्र मिलने के बाद तस्वीर बदल गई।

  • ​अब ग्रामीणों के पास अपने पारंपरिक जंगल पर कानूनी मालिकाना हक है।
  • ​प्रत्येक गाँव में 15 सदस्यीय प्रबंधन समिति का गठन किया गया है, जिसके पास निर्णय लेने की स्वायत्तता है।
  • ​आदिवासी विकास विभाग द्वारा आर्थिक सहायता (7,000 से 50,000 रुपये तक) मिलने से समितियों के पास अब अपने कार्यालय और बुनियादी ढांचा भी मौजूद है।

हाथी विशेषज्ञ की चेतावनी और भविष्य का रोडमैप – हाल ही में आयोजित एक भव्य सम्मेलन में हाथी विशेषज्ञ अमलेंदु मिश्रा ने पर्यावरण संकट पर गहरा प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि “पिछले दो दशकों में वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास खत्म होने से मानव-हाथी संघर्ष बढ़ा है। जंगल बचाना अब केवल शौक नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई है।”

सम्मेलन के प्रमुख बिंदु :

  • अग्नि सुरक्षा : गर्मी के दिनों में जंगल को आग (दावानल) से बचाने के लिए विशेष दल बनाए गए हैं।
  • जैविक खेती : रसायनों और कीटनाशकों के बढ़ते उपयोग को रोककर प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने का संकल्प लिया गया।
  • वृक्षारोपण : केवल लकड़ी नहीं, बल्कि फलदार और औषधीय पौधों को लगाकर जंगल को घना बनाने की योजना तैयार की गई है।

अनुभव साझा : पहाड़ी कोरवाओं का संघर्ष और जीत – सम्मेलन में पहुँचे बिगु राम और पातर जैसे पहाड़ी कोरवा समुदाय के लोगों ने भावुक कर देने वाले अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि कैसे उनके पूर्वजों ने जंगलों की पूजा की और आज वे उसी विरासत को बचाने के लिए अनाज का त्याग कर रहे हैं। बभौनी और गेरसा गाँवों के युवाओं ने भी इस तकनीक को ‘सबसे प्रभावी और टिकाऊ’ बताया है।

दुनिया के लिए एक संदेश – ​लुण्ड्रा की यह पहल यह स्पष्ट करती है कि पर्यावरण संरक्षण के लिए केवल ऊँचे मंचों से भाषण देना काफी नहीं है। जब ज़मीन से जुड़े लोग अपनी परंपराओं को आधुनिक अधिकारों के साथ जोड़ते हैं, तो सरगुजा जैसा चमत्कार होता है। यहाँ का हर घर आज एक रक्षक है, और हर मुट्ठी चावल जंगल की हरियाली की गारंटी है।

“जंगल की रक्षा, देश की सुरक्षा – अब सरगुजा ने दिखाया रास्ता!”

Admin : RM24

Investigative Journalist & RTI Activist

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