जंगलों में बिछी ‘इलेक्ट्रिक मौत’ पर हाईकोर्ट का वज्रपात: बहरे सिस्टम को लगी फटकार, अब ACS देंगे जवाब!…

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के जंगलों से आ रही बेजुबानों की चीखों ने आखिरकार न्याय के मंदिर के दरवाजे हिला दिए हैं। हाथियों और भालुओं की ‘करंट’ से हो रही सिलसिलेवार मौतों पर हाईकोर्ट ने रौद्र रूप अख्तियार कर लिया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की बेंच ने इस वीभत्स तमाशे पर स्वतः संज्ञान लेते हुए सीधे अपर मुख्य सचिव (ACS) को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
‘डेथ वारंट’ बना बिजली का तार : मार्च में बिछ गई लाशें! – कोर्ट में पेश की गई दलीलों ने यह साबित कर दिया कि छत्तीसगढ़ के जंगल अब वन्यजीवों के लिए सुरक्षित बसेरा नहीं, बल्कि ‘कत्लगाह’ बन चुके हैं। हस्तक्षेपकर्ता ने अखबारों की उन कतरनों को सबूत के तौर पर पेश किया, जो विभाग की लापरवाही पर कालिख पोत रही हैं:
- मासूमों का कत्लेआम : रायगढ़ में दो हाथी शावकों की लाशें मिलीं, जो अपनी मां के साथ जंगल की राह तलाश रहे थे, लेकिन उन्हें मिली सिर्फ ‘हाई वोल्टेज मौत’।
- कुनबे के कुनबे खत्म : कोरबा में एक मादा भालू और उसके दो बच्चों को करंट से भून दिया गया। क्या यह शिकार है या सिस्टम की सरपरस्ती में हो रही हत्या?
- इंसान भी नहीं सुरक्षित : शिकारियों के बिछाए जाल में सिर्फ जानवर ही नहीं, बल्कि बेगुनाह ग्रामीण भी अपनी जान गंवा रहे हैं। सारंगढ़ और मैनपाट की घटनाएं इसका जीता-जागता सबूत हैं।
हाईकोर्ट की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ – मुख्य बिंदु : कोर्ट ने केवल नाराजगी नहीं जताई, बल्कि शासन की चूले हिलाने वाला आदेश जारी किया है:
- ACS खुद देंगे जवाब : अब फाइलें नीचे के अधिकारियों पर नहीं थोपी जा सकेंगी। अपर मुख्य सचिव को खुद शपथ पत्र देकर बताना होगा कि विभाग सो रहा था या मिलीभगत थी?
- परिस्थितियों का पोस्टमार्टम : कोर्ट ने पूछा है कि आखिर किन हालात में ये मौतें हुईं? क्या बिजली कंपनी और वन विभाग के बीच कोई तालमेल है या सिर्फ कागजों पर गश्त हो रही है?
- जवाबदेही तय होगी : अधिकारियों को अब यह साबित करना होगा कि उन्होंने इन हत्याओं को रोकने के लिए ‘वास्तविक’ में क्या किया, न कि सिर्फ प्रेस विज्ञप्ति जारी की।
तल्ख टिप्पणी : “मौन है वन विभाग, खौफ में वन्यजीव” – राज्य में हाथियों की मौत का आंकड़ा जिस रफ्तार से बढ़ रहा है, उसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिंता पैदा की है। शिकारियों के हौसले इतने बुलंद हैं कि वे 11 KV की लाइनों से खुलेआम छेड़छाड़ कर रहे हैं, और विभाग ‘सब ठीक है’ का राग अलाप रहा है। हाईकोर्ट की इस सख्ती ने स्पष्ट कर दिया है कि अब ‘कुर्सी’ पर बैठे जिम्मेदारों को जवाबदेह बनना ही होगा।
“न्याय का तकाजा है कि बेजुबानों को उनका हक मिले। अगर जंगल सुरक्षित नहीं, तो हमारा भविष्य भी सुरक्षित नहीं है। कोर्ट की यह सख्ती उन तमाम लापरवाह अफसरों के लिए चेतावनी है जो अपनी जिम्मेदारी को फाइलों के नीचे दबाकर बैठे हैं।”




