लैलूंगा में आधार के नाम पर ‘अंधेरगर्दी’ : सरकारी केंद्रों पर ताले, निजी सेंटरों में लूट; जनता त्रस्त, कलेक्टर से गुहार…

रायगढ़/लैलूंगा: सरकारी दावों और नियमों को ठेंगा दिखाते हुए लैलूंगा क्षेत्र में आधार कार्ड बनवाना अब आम जनता के लिए ‘जेब कटवाने’ जैसा हो गया है। निर्धारित शुल्क की धज्जियां उड़ाते हुए आधार केंद्र संचालक आम नागरिकों से मनमानी वसूली कर रहे हैं। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इन हाउस मॉडल के तहत सरकारी कार्यालयों में व्यवस्था होने के बावजूद जनता को निजी हाथों में लुटने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
5 साल से कम उम्र के बच्चों का आधार: ‘नो प्रॉफिट, नो एंट्री’ – नियमों के मुताबिक, 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों का आधार कार्ड पूरी तरह निशुल्क बनाया जाना चाहिए। लेकिन लैलूंगा के संचालकों ने इसे कमाई का जरिया न देख, सेवा देने से ही पल्ला झाड़ लिया है। अभिभावकों का आरोप है कि बच्चों का आधार बनाने के नाम पर उन्हें बार-बार दौड़ाया जाता है और बहाने बनाकर लौटा दिया जाता है, क्योंकि इसमें संचालकों को ‘ऊपरी कमाई’ नहीं दिखती।
सरकारी दफ्तरों में सुस्ती, निजी केंद्रों में मस्ती – हैरानी इस बात की है कि लैलूंगा के जनपद पंचायत, नगर पंचायत, तहसील और एसडीएम कार्यालय में आधार संचालन की जिम्मेदारी है। लेकिन यहाँ काम कछुआ गति से चलता है या अक्सर बंद रहता है। सरकारी सिस्टम की इसी नाकामी का फायदा उठाकर निजी सेंटर संचालक जनता की मजबूरी का सौदा कर रहे हैं और मुंह मांगी रकम वसूल रहे हैं।
प्रमुख बिंदु : क्यों आक्रोशित है जनता?
- अवैध वसूली : तय शुल्क से दो से तीन गुना ज्यादा पैसों की मांग।
- सिस्टम फेल : सरकारी केंद्रों (In-House Model) का नियमित संचालन न होना।
- दबंगई : पहले भी दुकानें सील हुई थीं, लेकिन प्रशासन का खौफ खत्म हो चुका है।
- गरीबों पर मार : दूर-दराज के गांवों से आने वाले लोग आर्थिक बोझ तले दब रहे हैं।
शिकायत के बाद भी ढाक के वही तीन पात”
सूत्रों का कहना है कि पूर्व में तहसील स्तर पर कार्रवाई हुई थी, कुछ सेंटरों पर ताले भी जड़े गए थे। लेकिन कुछ दिन बीतते ही ‘लूट का खेल’ दोबारा शुरू हो गया। ऐसा प्रतीत होता है कि संचालकों को प्रशासन की कार्रवाई का रत्ती भर भी भय नहीं है।
कलेक्टर से सख्त कार्रवाई की आस – क्षेत्र के जागरूक नागरिकों ने अब कलेक्टर रायगढ़ को ज्ञापन सौंपकर इस ‘लूटतंत्र’ को बंद करने की मांग की है। ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि यदि सरकारी केंद्रों पर नियमित काम शुरू हो जाए और निजी सेंटरों की औचक जांच हो, तभी इस भ्रष्टाचार पर लगाम लग पाएगी।
अब सवाल यह उठता है कि क्या जिला प्रशासन इन ‘आधार माफियाओं’ पर हंटर चलाएगा, या लैलूंगा की गरीब जनता इसी तरह सिस्टम की लापरवाही की भेंट चढ़ती रहेगी?




