छत्तीसगढ़ के जंगलों में ‘लाल कोहरा’ : 3 साल, 562 मौतें; क्या अब सरकारी फाइलों में ही बचेंगे बाघ और हाथी?…

रायपुर। विशेष पड़ताल। छत्तीसगढ़ के हरे-भरे जंगलों से इन दिनों पक्षियों की चहचहाहट नहीं, बल्कि बेजुबानों की चीखें सुनाई दे रही हैं। वन्यजीव संरक्षण के नाम पर हर साल करोड़ों फूंकने वाला सिस्टम पूरी तरह ‘वेंटिलेटर’ पर नजर आ रहा है। पिछले 36 महीनों का डेटा किसी डरावनी फिल्म की पटकथा जैसा है – 9 बाघ और 38 हाथियों समेत 562 वन्यजीवों की मौत! यह आंकड़े नहीं, बल्कि हमारे ईको-सिस्टम की ढहती हुई दीवारें हैं।
शिकारियों की ‘सल्तनत’ और बेबस प्रशासन – सरकारी तंत्र जब चैन की नींद सो रहा था, तब शिकारी जंगलों में मौत का जाल बिछा रहे थे।
- खूनी आंकड़े : दिसंबर 2023 से अब तक 102 बार शिकारियों ने सिस्टम की छाती पर पैर रखकर अवैध शिकार को अंजाम दिया।
- बढ़ता दुस्साहस : 2024 में शिकार के 31 मामले थे, जो 2025 में लगभग दोगुने होकर 58 पहुँच गए। क्या वन विभाग का खौफ खत्म हो चुका है? या फिर शिकारी अब विभाग से दो कदम आगे निकल चुके हैं?
‘साइलेंट किलर’ बना बिजली का करंट – जंगलों के किनारे बिछाए गए मौत के नंगे तार वन्यजीवों के लिए फांसी का फंदा साबित हो रहे हैं।
- झुलसती जिंदगी : 30 वन्यप्राणियों को करंट ने जिंदा जला दिया।
- गजराज पर प्रहार : मरने वाले 38 हाथियों में से 13 की मौत सिर्फ करंट से हुई। धरमजयगढ़ से लेकर रायगढ़ तक, हाथी अब जंगलों में नहीं, बल्कि श्मशान में तब्दील होते गलियारों में चल रहे हैं।
टाइगर स्टेट का ‘पोस्टमार्टम’ : VIP इलाकों में भी मौत का तांडव – सबसे शर्मनाक तस्वीर तो उन इलाकों से आई है जिन्हें ‘हाई-सिक्योरिटी’ माना जाता है।
- अचानकमार टाइगर रिजर्व से लेकर नवा रायपुर की जंगल सफारी तक, 9 बाघों ने दम तोड़ दिया।
- इनमें से 2 बाघों की रगों में दौड़ने वाला खून करंट ने सुखा दिया, जबकि बाकी 7 बाघों की मौत के पीछे ‘कार्डियक अरेस्ट’ और ‘मल्टीपल ऑर्गन फेल्योर’ जैसे कारण बताए गए। सवाल यह है कि क्या पिंजरों और रिजर्व के भीतर भी बाघ तनाव और असुरक्षा में जी रहे हैं?
2025 : मौतों का ‘ब्लैक ईयर’ – वन विभाग के ही आंकड़े तस्दीक करते हैं कि साल 2025 छत्तीसगढ़ के वन्यजीवों के लिए ‘कयामत’ बनकर आया। अकेले इस साल 314 बेजुबान मारे गए। साल 2026 की शुरुआत भी कम खौफनाक नहीं है; जनवरी के महज 31 दिनों में 27 लाशें गिर चुकी हैं। सड़क हादसों में कुचले जा रहे चीतल, नीलगाय और तेंदुए यह बताने के लिए काफी हैं कि विकास की रफ्तार ने वन्यजीवों का रास्ता ही खत्म कर दिया है।
सिस्टम से तीखे सवाल :
- गश्त की पोल : जब शिकारी आधुनिक हथियारों और जाल के साथ जंगलों में घुस रहे हैं, तब विभाग का इंटेलिजेंस नेटवर्क क्या सिर्फ दफ्तरों तक सीमित है?
- सड़कों पर कत्लेआम : जंगलों को चीरती सड़कों पर ‘स्पीड ब्रेकर’ और ‘एनिमल अंडरपास’ क्यों सिर्फ कागजों पर ही रह गए?
- करंट का कहर : खेतों में अवैध बिजली कनेक्शन और खुले तारों पर बिजली विभाग और वन विभाग मिलकर लगाम क्यों नहीं लगा पा रहे?
जागिए, वरना बहुत देर हो जाएगी! – विशेषज्ञों की चेतावनी साफ है – अगर अवैध शिकार पर सर्जिकल स्ट्राइक नहीं हुई और संवेदनशील इलाकों में निगरानी के लिए ड्रोन और आधुनिक तकनीक का सहारा नहीं लिया गया, तो वह दिन दूर नहीं जब छत्तीसगढ़ के जंगलों में केवल सन्नाटा और सूखे पत्तों की आवाज रह जाएगी।
यह महज रिपोर्ट नहीं, उन 562 बेजुबानों की ओर से एक चेतावनी है जिन्हें हमने अपनी लापरवाही से मार डाला।




