सरगुजा ब्रिक्स केस : सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला; ‘जॉइंट वेंचर’ के अनुभव को खारिज करना असंवैधानिक…

नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया है कि सरकारी निविदाओं (Tenders) में किसी कंपनी के पुराने अनुभव को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि वह अनुभव ‘संयुक्त उद्यम’ (Joint Venture) के तौर पर हासिल किया गया था। न्यायालय ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के आदेश को पलटते हुए कहा कि निविदा प्रक्रिया में “कानूनी निश्चितता” होनी चाहिए और राज्य अपनी मर्जी से शर्तों की व्याख्या कर किसी को अयोग्य नहीं ठहरा सकता।
क्या था मुख्य विवाद? – छत्तीसगढ़ के लोक निर्माण विभाग (PWD) ने ग्राम रामगढ़ से कोटाडोल तक सड़क निर्माण के लिए ₹4521.56 लाख का टेंडर निकाला था। इस टेंडर की शर्त थी कि ठेकेदार ने पिछले 5 वर्षों में कम से कम एक ऐसा काम पूरा किया हो जिसकी कीमत कुल अनुबंध मूल्य के 50% के बराबर हो।
अपीलकर्ता, मेसर्स सरगुजा ब्रिक्स, ने एक अनुभव प्रमाणपत्र पेश किया जिसमें उसने एक संयुक्त उद्यम (MPSBI-JV) के साथ 49% के भागीदार के रूप में ₹4904.09 लाख का काम किया था। उसके हिस्से का अनुभव ₹2404.00 लाख बैठता था, जो 50% की शर्त (₹2261.00 लाख) से कहीं अधिक था। लेकिन विभाग ने उसे यह कहते हुए अयोग्य घोषित कर दिया कि यह अनुभव उसके ‘अपने व्यक्तिगत नाम’ में नहीं, बल्कि ‘संयुक्त उद्यम’ के नाम पर था।
सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी : “व्यावसायिक दृष्टिकोण अपनाए राज्य” – न्यायमूर्ति उज्ज्वल भूयान और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने विभाग के इस तर्क को “तर्कहीन और मनमाना” करार दिया। कोर्ट ने निम्नलिखित प्रमुख बिंदु रखे :
- अनुभव का अर्थ : किसी संयुक्त उद्यम का अनुभव वास्तव में उसके घटकों (Partners) का ही अनुभव होता है। यदि किसी भागीदार ने काम किया है, तो उसे उसके हिस्से का आनुपातिक श्रेय मिलना ही चाहिए।
- अस्पष्टता का लाभ : टेंडर दस्तावेजों में कहीं भी यह नहीं लिखा था कि संयुक्त उद्यम के अनुभव को शामिल नहीं किया जाएगा。 कोर्ट ने कहा कि पात्रता मानदंड स्पष्ट और असंदिग्ध होने चाहिए।
- समान अवसर (Level Playing Field) : राज्य अपनी एजेंसी के माध्यम से किसी नियम की ऐसी व्याख्या नहीं कर सकता जो भेदभावपूर्ण हो या मनमानी का रास्ता खोले।
”निविदा आमंत्रित करने वाली संस्था को अपनी शर्तों की व्याख्या करने की छूट है, लेकिन यदि वह व्याख्या बेतुकी, अतार्किक या मनमानी है, तो संवैधानिक न्यायालय हस्तक्षेप करने के लिए बाध्य है।”
फैसले का परिणाम : सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के 4 अप्रैल 2025 के फैसले और विभाग के 19 मार्च 2025 के अयोग्यता आदेश को रद्द (Set Aside) कर दिया है। कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे सरगुजा ब्रिक्स के संयुक्त उद्यम वाले अनुभव प्रमाणपत्र को स्वीकार करें और उनकी निविदा पर फिर से विचार करें।




