दाखिलाफी से भड़के 17 हजार स्वास्थ्य कर्मी : आश्वासन के 5 माह बाद भी फाइलें धूल फांक रहीं, अब विधानसभा घेराव की तैयारी…

सूरजपुर। छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य विभाग की रीढ़ माने जाने वाले राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के कर्मचारियों का धैर्य अब जवाब दे रहा है। मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री द्वारा दिए गए ठोस आश्वासन के 5 महीने बीत जाने के बाद भी मांगों का निराकरण न होने से प्रदेश के 17,500 कर्मचारियों में जबरदस्त आक्रोश है। प्रशासनिक लेटलतीफी के विरोध में अब संघ ने आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है और आगामी विधानसभा सत्र के दौरान विधानसभा घेराव का बिगुल फूंक दिया है।
क्या हैं वो 6 प्रमुख मांगें जो ठंडे बस्ते में हैं? – एनएचएम कर्मचारी वर्षों से बुनियादी सुविधाओं और हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। उनकी प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं:
- ग्रेड पे : नियमित कर्मचारियों की तर्ज पर ग्रेड पे का निर्धारण।
- मानव संसाधन नीति : नई और पारदर्शी HR पॉलिसी लागू करना।
- स्थानांतरण नीति : लंबे समय से लंबित ट्रांसफर पॉलिसी की मांग।
- अनुकंपा नियुक्ति : सेवा के दौरान मृत्यु होने पर आश्रितों को संबल।
- चिकित्सा सुविधा : कर्मचारियों के लिए चिकित्सा परिचर्या का लाभ।
- बीमा कवच : वेतन खाते के माध्यम से बीमा सुविधा का प्रावधान।
मंत्री की ‘सार्वजनिक घोषणा’ और फाइलों की ‘सुस्त चाल’ – संघ के पदाधिकारियों का आरोप है कि स्वास्थ्य मंत्री ने सार्वजनिक मंचों से मांगों को पूरा करने की घोषणा की थी, लेकिन धरातल पर नतीजा ‘शून्य’ है। फाइलें मंत्रालय के गलियारों में पिछले 150 दिनों से एक टेबल से दूसरे टेबल तक भटक रही हैं।
”मंत्री जी के आश्वासन के बाद भी प्रशासनिक सुस्ती यह बताती है कि सरकार कर्मचारियों के प्रति गंभीर नहीं है। यदि समय रहते आदेश जारी नहीं हुए, तो स्वास्थ्य सेवाएं ठप होंगी और इसकी पूरी जिम्मेदारी शासन की होगी।”
डॉ. अमित मिरी (प्रदेश अध्यक्ष), हेमंत सिन्हा (संरक्षक) एवं पुरन दास (प्रवक्ता)
सूरजपुर में हुंकार : आंदोलन की रणनीति तैयार – जिलाध्यक्ष बृजलाल पटेल ने स्पष्ट किया है कि प्रदेशभर के संविदा स्वास्थ्य कर्मचारी मानसिक रूप से प्रताड़ित महसूस कर रहे हैं। सूरजपुर समेत पूरे प्रदेश में बैठकों का दौर जारी है। कर्मचारियों का कहना है कि उन्होंने कोरोना काल से लेकर हर विपरीत परिस्थिति में स्वास्थ्य सेवाओं को संभाला है, लेकिन जब उनके हक की बारी आई, तो सिर्फ आश्वासन का झुनझुना थमा दिया गया।
बड़ा सवाल: क्या सरकार विधानसभा घेराव से पहले इन मांगों पर मुहर लगाएगी या प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था एक बड़े आंदोलन की भेंट चढ़ेगी?




