रायगढ़

एनटीपीसी लारा : 15 साल का इंतजार, अब आर-पार की जंग; आज मुख्य गेट पर हुंकार भरेगी ‘संघर्ष समिति’…

रायगढ़। विकास की वेदी पर अपनी जमीन कुर्बान करने वाले किसान आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। पुसौर विकासखंड में एनटीपीसी लारा परियोजना के लिए जमीन देने वाले सैकड़ों भू-विस्थापित परिवार पिछले 15 वर्षों से बुनियादी हकों की लड़ाई लड़ रहे हैं। शासन और प्रशासन की बेरुखी से तंग आकर लारा संघर्ष समिति ने आज (मंगलवार) एनटीपीसी के मुख्य गेट (छपोरा) पर एक दिवसीय विशाल धरना प्रदर्शन का ऐलान किया है।

वादों की पोटली खाली, विस्थापितों की फूटी किस्मत : ​करीब डेढ़ दशक पहले जब जिला प्रशासन ने राज्य की पुनर्वास नीति का हवाला देकर स्थानीय किसानों से जमीनें ली थीं, तब सुनहरे भविष्य के सपने दिखाए गए थे। लेकिन हकीकत यह है कि:

  • नियमित रोजगार: योग्यता होने के बावजूद स्थानीय युवाओं को दरकिनार किया गया।
  • शिक्षा व स्वास्थ्य: प्रभावित गांवों में स्वास्थ्य और उच्च शिक्षा की सुविधाएं आज भी कागजों तक सीमित हैं।
  • पुनर्वास नीति की धज्जियां: विस्थापितों का आरोप है कि नीति का पालन करने के बजाय केवल अनियमितताओं को बढ़ावा दिया गया।

“हमने जमीन दी ताकि देश को बिजली मिले, लेकिन बदले में हमें सिर्फ अंधेरा और बेरोजगारी मिली। अब आश्वासन नहीं, अधिकार चाहिए।” – लारा संघर्ष समिति

प्रशासनिक चुप्पी ने भड़काई आक्रोश की आग : संघर्ष समिति ने बीते 19 जनवरी को कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर दो टूक मांग रखी थी। समिति का कहना है कि यदि एनटीपीसी नियमित रोजगार देने में असमर्थ है, तो पिछले 15 वर्षों का बेरोजगारी भत्ता दिया जाए। महीनों बीत जाने के बाद भी जब प्रशासन की ओर से कोई ठोस पहल नहीं हुई, तो प्रभावितों ने सड़क पर उतरने का फैसला लिया।

आज क्या होगा? – छपोरा स्थित एनटीपीसी के मुख्य गेट पर आज बड़ी संख्या में भू-विस्थापित, सामाजिक संगठन और जनप्रतिनिधि जुटेंगे। समिति ने स्पष्ट किया है कि यह प्रदर्शन केवल एक चेतावनी है—अगर अब भी उनकी मांगों पर विचार नहीं किया गया, तो यह आंदोलन उग्र रूप ले सकता है।

प्रमुख मांगें जिन पर अड़े हैं ग्रामीण :

  1. ​सभी पात्र भू-विस्थापितों को योग्यतानुसार नियमित नौकरी
  2. ​रोजगार न मिलने तक 15 साल का बकाया बेरोजगारी भत्ता
  3. ​पुनर्वास नीति के तहत क्षेत्र में स्तरीय अस्पताल और स्कूल का निर्माण।
  4. ​परियोजना के नाम पर हुई अनियमितताओं की उच्च स्तरीय जांच

Ambika Sao

सह-संपादक : छत्तीसगढ़

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