मरवाही का ‘जादुई’ जंगल : जहाँ लकड़ियाँ गायब होती हैं और साहबों को ‘निजी मामला’ दिखता है!…

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। छत्तीसगढ़ के वनों में इन दिनों एक अद्भुत ‘सर्कस’ चल रहा है। इस सर्कस के मुख्य कलाकार हैं—मरवाही वन मंडल के वो जिम्मेदार कंधे, जिन पर जंगलों को बचाने का बोझ था, लेकिन लगता है उन्होंने इस बोझ को ‘रिश्वत’ की गड्डियों से हल्का कर लिया है।
जीपीएम जिले के मरवाही वन मंडल में अवैध कटाई और पैसों के लेनदेन का जो खेल उजागर हुआ है, उसने साबित कर दिया है कि यहाँ के ‘रक्षक’ ही ‘भक्षक’ की भूमिका में ऑस्कर लेवल की एक्टिंग कर रहे हैं।
साहब का चश्मा : जब ‘भ्रष्टाचार’ भी ‘व्यक्तिगत’ लगने लगे – हैरानी की बात यह नहीं है कि जंगल कट रहे हैं; हैरानी इस बात पर है कि मुख्य वन संरक्षक (CCF) मनोज कुमार पाण्डेय जी को इसमें कुछ गलत ही नहीं लग रहा। अपने एक दिवसीय दौरे पर जब उनके सामने अवैध कटाई और पैसों के लेन-देन के ‘लौह साक्ष्य’ रखे गए, तो साहब ने बड़ी मासूमियत से इसे “व्यक्तिगत मामला” करार दे दिया।
व्यंग्य की बात : शायद विभाग की डिक्शनरी में सरकारी जंगल की लकड़ी बेचना और उसका पैसा डकारना अब ‘निजी शौक’ या ‘हॉबी’ की श्रेणी में आता है। अगर करोड़ों का गबन व्यक्तिगत है, तो फिर सरकारी वेतन लेना शायद ‘सामाजिक सेवा’ होगा!
फाइलें जो कछुए की चाल से चलती हैं – मामले में अब तक की कार्रवाई का रिकॉर्ड इतना शानदार है कि उसे ‘स्वच्छता अभियान’ का हिस्सा होना चाहिए—क्योंकि विभाग ने सबूतों और फाइलों को इतनी सफाई से दबाया है कि कुछ बचा ही नहीं। सीसीएफ और डीएफओ महोदय अपराधियों के लिए ऐसी ‘ढाल’ बनकर खड़े हैं, जैसी ढाल शायद फिल्म ‘बाहुबली’ में भी नहीं दिखी थी।
- जांच का ढोंग : जाँच के नाम पर फाइलें एक मेज से दूसरी मेज तक ऐसे घूम रही हैं जैसे कोई ‘म्यूजिकल चेयर’ का खेल चल रहा हो।
- मौन स्वीकृति : स्थानीय गलियारों में चर्चा है कि बिना ‘ऊपर’ तक हिस्सा पहुँचाए, परिंदा भी पर नहीं मार सकता, फिर यहाँ तो पूरी की पूरी कीमती लकड़ियाँ ट्रक में भरकर निकल गईं।
तंत्र मंत्र या तंत्र की यंत्र? – जंगल से लकड़ी कटी, परिवहन हुआ और बिक भी गई। हर नाके पर ‘साहबों’ की नजरें शायद उस समय योग की मुद्रा में बंद थीं। अब शासन-प्रशासन की ओर जनता टकटकी लगाए बैठी है। क्या दोषियों पर गाज गिरेगी? या फिर जाँच की फाइलें किसी दीमक का निवाला बन जाएंगी (ताकि दीमकों पर सारा दोष मढ़ा जा सके)?
सवाल बड़ा है : जंगल बचेगा या सिर्फ जंगलात विभाग की जेबें भरेंगी?




