छेरछेरा : छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति का महाकुंभ और दान की गौरवगाथा…

छत्तीसगढ़ जिसे ‘धान का कटोरा’ कहा जाता है, वहाँ पौष पूर्णिमा के दिन मनाया जाने वाला ‘छेरछेरा’ केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि कृषक संस्कृति की कृतज्ञता का उत्सव है। यह पर्व ‘अन्नदान’ के माध्यम से समाज में समानता लाने का एक अनूठा प्रयास है।
दार्शनिक और धार्मिक आधार : छेरछेरा का आधार ‘अन्नपूर्णा’ और ‘शाकंभरी’ देवी की पूजा है। मान्यता है कि इसी दिन माता पार्वती ने संसार के कल्याण हेतु अन्नपूर्णा का रूप धारण कर भगवान शिव को भिक्षा दी थी। छत्तीसगढ़ी लोकमानस में यह विश्वास है कि इस दिन दान देने से वर्ष भर अन्न के भंडार खाली नहीं होते।
- शाकंभरी जयंती का संयोग : इस दिन को ‘शाकंभरी जयंती’ के रूप में भी मनाया जाता है। चूंकि छत्तीसगढ़ एक कृषि प्रधान राज्य है, इसलिए यहाँ ‘धान’ को ही लक्ष्मी और अन्नपूर्णा का साक्षात स्वरूप माना जाता है।
ऐतिहासिक संदर्भ : राजा कल्याण साय की परंपरा – इतिहासकारों के अनुसार, रतनपुर के राजा कल्याण साय जब मुगल सम्राट जहांगीर के दरबार में 8 वर्ष बिताकर वापस अपनी रियासत लौटे थे, तब उनकी प्रजा ने भारी उत्साह मनाया था। राजा ने खुशी में अपने खजाने खोल दिए और प्रजा को स्वर्ण मुद्राएं बांटी थीं। उसी स्मृति में ‘दान’ देने की यह परंपरा शुरू हुई, जो कालांतर में अनाज (धान) के दान में बदल गई।
छेरछेरा की अद्वितीय कार्यविधि (Rituals) : इस त्योहार की प्रक्रिया सुबह ब्रह्म मुहूर्त से ही शुरू हो जाती है :
- स्नान और पूजन : ग्रामीण तड़के उठकर तालाबों और नदियों में स्नान करते हैं। इसके बाद नए धान की पूजा कर उसे दान के लिए निकाला जाता है।
- छेरछेरा टोली : यह इस पर्व का सबसे जीवंत हिस्सा है। टोलियां तीन प्रकार की होती हैं:
- बाल मंडली : छोटे बच्चे थैले लेकर घर-घर जाते हैं।
- युवा मंडली : ये डंडा नृत्य (सैला) करते हुए वीरता और उल्लास का प्रदर्शन करते हैं।
- महिला मंडली : महिलाएं सुआ नृत्य करते हुए समूह में निकलती हैं।
- भिक्षा का आह्वान : टोलियां घरों के सामने खड़ी होकर ऊँचे स्वर में घोष करती हैं: “माई कोठी के धान ला हेरते हेरा, छेरछेरा, माई कोठी के धान ला हेरते हेरा!” (अर्थ: घर की मालकिन, अपनी मुख्य कोठी से धान निकालिए, छेरछेरा आ गया है!)
सांस्कृतिक तत्व और लोक नृत्य : छेरछेरा के अवसर पर छत्तीसगढ़ की लोक कलाएं अपने चरम पर होती हैं –
- डंडा नृत्य : डंडों की थाप पर किया जाने वाला पुरुष प्रधान नृत्य, जो अनुशासन और समन्वय का प्रतीक है।
- सुआ नृत्य : महिलाओं द्वारा मिट्टी के तोते (सुआ) को साक्षी मानकर किया जाने वाला नृत्य।
- नकटौरा : विभिन्न प्रकार के स्वांग (जैसे- मुखौटा पहनकर रीछ, बंदर या जोकर बनना) रचना ताकि दान देने वाले का मनोरंजन हो सके।
आर्थिक और सामाजिक महत्व : यह पर्व ग्रामीण अर्थव्यवस्था और समाजशास्त्र का एक सुंदर मिश्रण है:
- संग्रहण और सहयोग : मांगकर इकट्ठा किए गए धान का उपयोग अक्सर सामूहिक कार्यों, जैसे—गांव के मंदिर की मरम्मत, तालाब की सफाई या सामूहिक भोज के लिए किया जाता है।
- अहंकार का त्याग : इस दिन बड़े-से-बड़ा संपन्न व्यक्ति भी ‘याचक’ (मांगने वाला) बनकर निकलता है, जो व्यक्ति के भीतर से अहंकार को मिटाकर विनम्रता लाता है।
- सामाजिक समरसता : दान देने वाला और लेने वाला किसी भी जाति या वर्ग का हो सकता है। यह ‘छुआछूत’ और ‘ऊंच-नीच’ की दीवारों को ढहाने वाला पर्व है।
पारंपरिक खान-पान : छेरछेरा के दिन रसोई में विशेष महक होती है। चूंकि फसल नई होती है, इसलिए नए चावल के व्यंजन मुख्य होते हैं:
- पीठा : चावल के आटे को भाप में पकाकर या तलकर बनाया जाता है।
- चौसेला : चावल के आटे की पूड़ियाँ।
- धुसका और फरा : छत्तीसगढ़ के पारंपरिक जायके।
आधुनिक दौर में छेरछेरा : आज के मशीनी युग में भी इस पर्व की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है। अब यह केवल गांवों तक सीमित नहीं है, बल्कि रायपुर, बिलासपुर जैसे महानगरों में भी ‘छेरछेरा महोत्सव’ का आयोजन होता है। राजनेता, अधिकारी और कलाकार सभी इस उत्सव में शामिल होकर अपनी जड़ों से जुड़ते हैं। सरकार द्वारा इस दिन सार्वजनिक अवकाश घोषित किया जाता है, जो इसकी महत्ता को दर्शाता है।
छेरछेरा पर्व हमें “तेन त्यक्तेन भुंजीथा” (त्याग के साथ भोग करो) का संदेश देता है। यह सिखाता है कि प्रकृति ने हमें जो दिया है, उस पर केवल हमारा अधिकार नहीं है, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति का भी हिस्सा है।



