रायपुर

‘भारतमाला’ या भ्रष्टाचार की माला? पहली मानसूनी बारिश में बह गया रायपुर-विशाखापट्टनम कॉरिडोर; 106 किमी में 20 दरारें, 25 पैचवर्क, हवा में लटके पुल…

रायपुर। जिस रायपुर-विशाखापट्टनम भारतमाला इकोनॉमिक कॉरिडोर को केंद्र सरकार का ड्रीम इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट बताकर 100 से 120 किमी/घंटा की रफ्तार के दावे किए जा रहे थे, उसकी हकीकत पहली ही मानसूनी बारिश ने तार-तार कर दी है। छत्तीसगढ़ की सीमा में 4,146.08 करोड़ रुपये की लागत से तैयार हो रहे इस 124.661 किमी लंबे एक्सप्रेसवे पर रफ्तार भरने से पहले ही ‘ब्रेक’ लग गया है।

​जमीनी पड़ताल में जो सच सामने आया है, वह न केवल चौंकाने वाला है बल्कि सरकारी दावों और निर्माण एजेंसियों की सांठगांठ पर गंभीर सवाल खड़े करता है। बनकर तैयार बताए जा रहे 106 किमी के हिस्से में 20 से ज्यादा खतरनाक दरारें, 25 से अधिक स्थानों पर घटिया लीपापोती (पैचवर्क) और ढहते हुए एप्रोच एम्बैंकमेंट साफ गवाही दे रहे हैं कि यहां तकनीक नहीं, बल्कि भारी लापरवाही और कमीशनखोरी का खेल हुआ है।

जमीनी हकीकत : कदम-कदम पर भ्रष्टाचार के निशान –

  • कुरुद में 1 किमी के भीतर 10 पैचवर्क : कुरुद से महज 8 किलोमीटर पहले एक हैरान करने वाला नजारा दिखा। यहां 1 किलोमीटर के दायरे में ही 10 से ज्यादा बड़े-बड़े पैचवर्क नजर आ रहे हैं। नई बिछाई गई डामर की परत उखड़ चुकी है और उसे छिपाने के लिए आनन-फानन में डामर-गिट्टी के थिगड़े लगाए गए हैं।
  • 20 से अधिक जानलेवा दरारें : कुरुद से टनल की ओर बढ़ने पर मुख्य कैरिजवे पर जगह-जगह सड़क बीच से फटी हुई दिखी। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह घटिया सब-ग्रेड कॉम्पैक्शन का सीधा नतीजा है, जो भारी वाहनों का दबाव सहने से पहले ही दम तोड़ चुका है।
  • दुधावा-धनोरा में ताश के पत्तों की तरह ढहा एप्रोच : कांकेर जिले के दुधावा से धनोरा खंड में निर्माण का सबसे भयावह चेहरा सामने आया। यहां पुल के दोनों तरफ सड़क को ऊपर उठाने के लिए बनाया गया एप्रोच एम्बैंकमेंट (मिट्टी-पत्थर का भराव) पानी के साथ बह गया। पुल की सुरक्षा के लिए बना ढलान (स्लोप) पूरी तरह कट चुका है और सड़क का किनारा हवा में झूल रहा है।

दुधावा में रास्ता सील : टोल प्लाजा से पहले ब्लॉकेड, संकरी गलियों में फंसे भारी वाहन – पुल और एप्रोच के धंसने के बाद एनएचएआई और ठेका एजेंसी ने आनन-फानन में दुधावा के पास मुख्य सड़क पर बैरिकेडिंग कर रास्ता पूरी तरह बंद कर दिया है।

  • टोल से निकलना नामुमकिन : यहां से न तो वाहन आगे बढ़ पा रहे हैं और न ही कांकेर की ओर बने नए टोल प्लाजा से बाहर निकल पा रहे हैं।
  • ग्रामीणों की जान आफत में : पूरे ट्रैफिक को पास के गांव की संकरी, कीचड़ भरी और जर्जर गलियों में डायवर्ट कर दिया गया है। 18 और 22 चक्का वाले भारी ट्रकों के गांव की गलियों में घुसने से स्थानीय ग्रामीणों में भारी आक्रोश है और गंभीर हादसों का खतरा मंडरा रहा है।

पैकेज-3 की पोल : ओडिशा में फर्राटा, छत्तीसगढ़ में टनल के आगे 20 किमी तक जंगल-झाड़ी – पूरे प्रोजेक्ट को तीन पैकेजों में बांटा गया था। पैकेज 1 और 2 को पूरा दिखाकर वाहवाही लूटी जा रही थी, लेकिन पैकेज-3 की हकीकत शर्मनाक है :

  • टनल के मुहाने बंद : कांकेर और कोंडागांव के बीच पहाड़ी पर बन रही टनल के एक मुहाने पर मलबा हटाने का काम चल रहा है, जबकि दूसरा मुहाना अब तक पूरी तरह बंद है।
  • 10 पुल ‘लावारिस’, एप्रोच रोड गायब : टनल से लेकर ओडिशा सीमा तक करीब 20 किमी का हिस्सा अभी भी अधूरा है। इस रूट पर 10 से ज्यादा पुल तो खड़े कर दिए गए हैं, लेकिन उन तक पहुंचने के लिए न तो सड़क है और न एप्रोच। कहीं केवल मुरम का ढेर है तो कहीं गिट्टी बिखेरकर औपचारिकता निभाई जा रही है।
  • सीमा पार ओडिशा का काम पूरा : चौंकाने वाली बात यह है कि इसी कॉरिडोर का जो हिस्सा ओडिशा राज्य में आता है, वह पूरी तरह बनकर तैयार हो चुका है, लेकिन छत्तीसगढ़ में एनएचएआई की सुस्ती और घटिया निर्माण प्रोजेक्ट को ले डूबा।

एक्सपर्ट का कड़ा प्रहार: ‘यह बारिश का नहीं, कमीशनखोरी और लीपापोती का नतीजा’

“जिस जगह पर सड़क या पुल बनता है, वहां की सॉइल मैकेनिक्स (मिट्टी की प्रकृति) के हिसाब से स्पेसिफिक मटीरियल तय होता है। हर लेयर बिछाने के बाद तकनीकी मानकों के तहत रोलिंग और कॉम्पैक्शन जरूरी होता है। अगर पहली ही बारिश में सड़क धंस रही है, कैरिजवे पर दरारें आ रही हैं और एम्बैंकमेंट बह रहा है, तो यह सीधा सबूत है कि काम में भारी लीपापोती हुई है, कम मटीरियल डाला गया है और गुणवत्ता के साथ खुला खिलवाड़ किया गया है।”

डॉ. पी.एस.एल. राव, डायरेक्टर, स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर, नई दिल्ली

एनएचएआई का लीपापोती भरा जवाब : ‘बारिश में तो ऐसा होता ही है’

“मानसून की तेज बारिश में इस तरह की स्थिति बन जाती है। स्लोप ज्यादा दूर तक कटे तो सड़क को खतरा होता है, लेकिन सड़क और स्लोप के बीच 4 से 5 मीटर का सुरक्षित फासला है, इसलिए सड़क को कोई नुकसान नहीं होगा। हमने स्लोप की रिपेयरिंग कर दी है। चूंकि निर्माण कार्य अभी अंतिम चरण में चल रहा है, इसलिए कुछ स्थानों पर ऐसी दिक्कतें आ रही हैं। काम पूरा होने के बाद सब ठीक हो जाएगा।”

शमशेर सिंह, प्रोजेक्ट डायरेक्टर, एनएचएआई

बड़ा सवाल : 4 हजार करोड़ की बर्बादी का जिम्मेदार कौन? – चार हजार करोड़ से ज्यादा की जनता की गाढ़ी कमाई खर्च होने के बावजूद अगर एक ही बारिश में एक्सप्रेसवे का यह हाल है, तो आने वाले समय में 100 की रफ्तार से दौड़ने वाली गाड़ियों और आम लोगों की सुरक्षा की गारंटी कौन लेगा? क्या उच्च स्तर पर जांच बैठाकर लापरवाह ठेकेदारों और अधिकारियों पर एफआईआर दर्ज होगी या फिर हमेशा की तरह इसे ‘प्राकृतिक आपदा’ बताकर फाइलों में दबा दिया जाएगा?

Admin : RM24

Investigative Journalist & RTI Activist

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