“सिस्टम का ‘राख-अभिषेक’ : रातों-रात बिछ रही मौत की चादर, क्या राख माफिया के आगे नतमस्तक है रायगढ़ प्रशासन?…”

रायगढ़। जिले का घरघोड़ा ब्लॉक, और विशेषकर नवापारा का इलाका, आज विकास की नहीं बल्कि विनाश की इबारत लिख रहा है। यहाँ की हवा में घुली ‘फ्लाई ऐश’ (राख) अब ग्रामीणों के लिए धीमी मौत (Slow Poison) बन चुकी है। उद्योगों ने नवापारा को अपना ‘प्राइवेट डंपिंग यार्ड’ समझ लिया है, जहाँ नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए रातों-रात राख के पहाड़ खड़े किए जा रहे हैं।
रात के अंधेरे में ‘अवैध कारोबार’ का खेल – नवापारा की सड़कों पर रात होते ही यमराज के दूत बनकर राख से लदे हाईवा (Trucks) सड़कों पर दौड़ते हैं। बिना तिरपाल ढके, हवा में जहर उगलते ये वाहन न केवल हादसों को न्यौता दे रहे हैं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी (NGT) के उन तमाम गाइडलाइन्स का मजाक उड़ा रहे हैं, जिनमें राख परिवहन के सख्त नियम हैं। सवाल यह है कि पुलिस और परिवहन विभाग की नाक के नीचे यह ‘काली डंपिंग’ कैसे हो रही है?
‘सफेद’ खेत और ‘काली’ किस्मत – नवापारा के किसानों की पीढ़ियों की कमाई, उनकी उपजाऊ जमीन, अब राख के नीचे दफन हो चुकी है। खेतों में राख की 2 से 3 इंच मोटी परत जम गई है।
- फसलों की बर्बादी : धान की बालियां निकलने से पहले ही राख की वजह से झुलस रही हैं।
- भूजल का संकट : राख में मौजूद भारी धातुएं (Heavy Metals) रिसकर जमीन के अंदर जा रही हैं, जिससे पीने का पानी जहरीला हो रहा है।
मासूमों की सांसों पर पहरा – नवापारा और आसपास के स्कूलों में जाने वाले बच्चों के चेहरे अब धूल से सने रहते हैं। स्थानीय डॉक्टरों के अनुसार, क्षेत्र में अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और आंखों के इन्फेक्शन के मरीजों में 40% की बढ़ोतरी हुई है। क्या उद्योगों का मुनाफा इन मासूमों की जिंदगी से बढ़कर है?
प्रशासन का ‘जुर्माना’ कार्ड : समाधान या छलावा? – विधानसभा में सरकार ने स्वीकार किया कि करोड़ों का जुर्माना लगाया गया है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि उद्योग जुर्माना भरकर फिर से वही अपराध दोहराते हैं। यह ‘पे एंड पोल्यूट’ (पैसे दो और प्रदूषण करो) वाला मॉडल बन चुका है। पर्यावरण विभाग के अधिकारी एसी कमरों में बैठकर रिपोर्ट तैयार करते हैं, जबकि धरातल पर नवापारा की जनता राख के बवंडर में घुट रही है।
धारदार सवाल (सीधे जवाब मांगते प्रश्न) :
- कलेक्टर साहब जवाब दें : क्या उद्योगों को खुली छूट दे दी गई है कि वे जब चाहें, जहां चाहें किसी की भी निजी जमीन या सरकारी जमीन को राख से भर दें?
- पर्यावरण विभाग मौन क्यों? : नोटिस-नोटिस खेलने के बजाय, दोषी प्लांट्स की बिजली क्यों नहीं काटी जाती? उनका उत्पादन बंद क्यों नहीं किया जाता?
- जनप्रतिनिधियों की चुप्पी : वोट मांगने आने वाले नेता आज नवापारा की इस ‘राख वाली होली’ पर चुप क्यों हैं?
अब आर-पार की जंग – नवापारा का धैर्य अब जवाब दे रहा है। यह रिपोर्ट एक चेतावनी है – अगर समय रहते डंपिंग पर पूर्ण रोक नहीं लगी और डंप की गई राख का वैज्ञानिक निपटान नहीं हुआ, तो यह राख का ढेर किसी दिन जन – आक्रोश के ज्वालामुखी में बदल जाएगा।
“हुक्मरान याद रखें, जब फेफड़े पत्थर के हो जाएंगे, तो जनता पत्थर उठाएगी, फिर आपकी फाइलें और वादे काम नहीं आएंगे।”




