बिलासपुर

विशेष रिपोर्ट : ‘मरते हुए व्यक्ति के होंठों पर सत्य होता है’ – हाई कोर्ट ने बरकरार रखी हत्यारे पति की उम्रकैद…

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने कबीरधाम जिले के पांडातराई में हुए एक नृशंस हत्याकांड में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने अपनी पत्नी को जिंदा जलाने वाले दोषी पति की अपील को खारिज करते हुए निचली अदालत द्वारा दी गई उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि मृत्यु पूर्व दिया गया बयान (Dying Declaration) अपराधी को सलाखों के पीछे भेजने के लिए पर्याप्त और ठोस आधार है।

घटना का विवरण : शक, साजिश और क्रूरता – यह रूह कंपा देने वाली घटना 18 नवंबर 2019 की है। पांडातराई निवासी संतोष उर्फ गोलू श्रीवास्तव अपनी पत्नी लता श्रीवास्तव के चरित्र पर संदेह करता था। इसी सनक के चलते उनके बीच अक्सर विवाद होता था।

घटना के दिन विवाद इतना बढ़ा कि संतोष ने हैवानियत की सारी हदें पार कर दीं :

  • ​उसने घर का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया ताकि लता बाहर न भाग सके।
  • ​पत्नी पर मिट्टी का तेल (केरोसीन) उड़ेलकर उसे आग के हवाले कर दिया।
  • ​जब लता आग की लपटों में घिरी चीख रही थी, तब आरोपी पति मदद करने के बजाय बाहर खड़े होकर ‘तमाशबीन’ बना रहा।

तालाब में कूदकर बचाने की कोशिश, पर हार गई जिंदगी –  अत्यधिक जल चुकी लता ने अपनी जान बचाने के लिए अंतिम संघर्ष किया। वह जलती हुई हालत में घर से निकली और पास ही स्थित तालाब में कूद गई। पड़ोसियों ने उसे इस भयावह स्थिति में देखा और उसे तत्काल जिला अस्पताल ले जाया गया। अस्पताल में करीब 21 दिनों तक जिंदगी और मौत के बीच जूझते हुए, अंततः 9 दिसंबर 2019 को ‘सेप्टिक शॉक’ के कारण उसकी मृत्यु हो गई।

कानूनी मोड़ : मरते हुए व्यक्ति का सत्य – इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण कड़ी लता का वह बयान था, जो उसने कार्यपालिक मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज कराया था।

हाई कोर्ट की तल्ख टिप्पणी – अपील की सुनवाई के दौरान माननीय उच्च न्यायालय ने कहा :

​”कानून की यह स्थापित धारणा है कि मरता हुआ व्यक्ति झूठ नहीं बोलता। मरते हुए व्यक्ति के होठों पर सत्य निवास करता है। यदि मृत्यु पूर्व दिया गया बयान विश्वसनीय और स्वैच्छिक है, तो बिना किसी अन्य गवाह के भी केवल इसी आधार पर सजा दी जा सकती है।”

दोषी के खिलाफ मजबूत सबूत – अदालत ने सजा बरकरार रखने के लिए निम्नलिखित तथ्यों को आधार बनाया :

  • मेडिकल रिपोर्ट : डॉक्टर ने पुष्टि की थी कि बयान देते समय लता मानसिक रूप से ‘फिट’ थी।
  • चश्मदीद : पड़ोसी सावित्री बाई और सुशीला बाई ने पीड़िता को जलती हालत में तालाब की ओर भागते देखा था।
  • फोरेंसिक साक्ष्य : आरोपी की टी-शर्ट और घटनास्थल से मिले जले हुए कपड़ों पर मिट्टी तेल के अंश पाए गए थे।
  • आचरण : आरोपी ने अपनी पत्नी को बचाने का कोई प्रयास नहीं किया, जो उसकी आपराधिक मंशा को दर्शाता है।

न्याय की जीत – ट्रायल कोर्ट ने पहले ही संतोष को हत्या का दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। आरोपी ने इस फैसले को चुनौती दी थी, लेकिन हाई कोर्ट ने उसकी सभी दलीलों को निराधार बताते हुए खारिज कर दिया।

यह फैसला न केवल एक मृत महिला को न्याय प्रदान करता है, बल्कि समाज में यह कड़ा संदेश भी देता है कि घरेलू हिंसा और शक के आधार पर की गई क्रूरता को कानून कभी क्षमा नहीं करेगा।

Admin : RM24

Investigative Journalist & RTI Activist

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