विशेष कवरेज : शिक्षा का ‘ब्लैक होल’ और कमीशन का खेल – निजी स्कूलों की तानाशाही की ग्राउंड रिपोर्ट…

रायपुर। विशेष संवाददाता।आज के दौर में शिक्षा ‘संस्कार’ से ज्यादा ‘व्यापार’ की भेंट चढ़ चुकी है। कार्टूनिस्ट सागर कुमार (@Sagarkumarcartoonist) का हालिया कार्टून सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल रहा है, जो रायपुर ही नहीं बल्कि पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था के उस बदसूरत चेहरे को उजागर करता है, जिसे हम अक्सर ‘प्रतिष्ठित स्कूल’ के नाम से जानते हैं।
कमीशन का सिंडिकेट : कॉपी से लेकर जूतों तक ‘फिक्स्ड’ दुकानें – सागर कुमार के कार्टून में जो बेबस अभिभावक हाथ जोड़कर कह रहा है कि “सब्जी-भाजी भी वहीं से खरीदूंगा जहाँ से आप कहेंगे”, वह केवल व्यंग्य नहीं, बल्कि एक कड़वा सच है।
रिपोर्टों के अनुसार, रायपुर सहित कई बड़े शहरों के निजी स्कूलों ने शहर के चुनिंदा बुक डिपो और यूनिफॉर्म विक्रेताओं के साथ ‘गोपनीय अनुबंध’ कर रखा है।
- 30% से 50% तक कमीशन : बाजार में जो कॉपी 40 रुपये की मिलती है, स्कूल द्वारा निर्देशित दुकान पर वही कॉपी ‘स्कूल लोगो’ के नाम पर 80 रुपये में बेची जा रही है।
- मोनोपॉली का खेल : कई स्कूल तो अब परिसर के भीतर ही दुकानें खोल चुके हैं या फिर ऐसी दुकानों का पता देते हैं जो शहर के दूसरे कोने में होती हैं, ताकि अभिभावक कहीं और से रेट की तुलना न कर सकें।
अभिभावकों की ‘चुप्पी’ के पीछे का मनोवैज्ञानिक दबाव – कार्टून में अभिभावक के गले में बंधी रस्सी उस मानसिक गुलामी का प्रतीक है जिसे हर पेरेंट्स महसूस करते हैं। अभिभावक जानते हैं कि उनके साथ लूट हो रही है, लेकिन वे बोलने से डरते हैं।
”अगर हमने विरोध किया, तो स्कूल हमारे बच्चे को टारगेट करेगा। उसे क्लास में अपमानित किया जा सकता है या उसके इंटरनल मार्क्स काटे जा सकते हैं।” — यह वह अदृश्य डर है जिसका फायदा स्कूल प्रबंधन बखूबी उठाता है।
सरकारी स्कूलों की बदहाली : निजीकरण को खाद-पानी – यह समस्या सिर्फ निजी स्कूलों की दादागिरी की नहीं है, बल्कि सरकारी तंत्र की विफलता की भी है।
- विकल्पहीनता : जब सरकारी स्कूलों की छतें टपकती हैं और वहां शिक्षकों का अभाव होता है, तो मध्यमवर्ग के पास निजी स्कूलों की ‘शर्तें’ मानने के अलावा कोई चारा नहीं बचता।
- कागजी कार्रवाई : प्रशासन हर साल “महंगी किताबों पर रोक” का नोटिस जारी करता है, लेकिन धरातल पर एक भी बड़े स्कूल पर कड़ी कार्रवाई नहीं होती। यह साठगांठ की ओर इशारा करता है।
क्या शिक्षा अब केवल ‘प्रीमियम’ प्रोडक्ट है? – सागर कुमार का कार्टून एक बड़ा दार्शनिक सवाल भी खड़ा करता है। यदि शिक्षा केवल भारी-भरकम फीस और कमीशन देने वालों तक सीमित हो जाएगी, तो समाज के गरीब और निम्न-मध्यम वर्ग का क्या होगा? यह व्यवस्था ‘बौद्धिक विभाजन’ पैदा कर रही है, जहाँ ज्ञान की गुणवत्ता जेब की गहराई से तय हो रही है।
समाधान की मांग : अब और नहीं! – इस खबर के माध्यम से समाज और सरकार से कुछ कड़े सवाल पूछे जा रहे हैं :
- रेगुलेटरी बॉडी कहाँ है? निजी स्कूलों की फीस और सहायक सामग्री की कीमतों पर लगाम लगाने के लिए एक सशक्त कमीशन क्यों नहीं बनाया जाता?
- NCERT का अनिवार्य उपयोग: सरकार निजी प्रकाशकों की किताबों के बजाय NCERT की किताबों को हर निजी स्कूल में अनिवार्य क्यों नहीं करती?
- जन-आंदोलन की जरूरत: जब तक अभिभावक व्यक्तिगत डर को त्यागकर ‘पेरेंट्स एसोसिएशन’ के माध्यम से एकजुट नहीं होंगे, तब तक यह शोषण जारी रहेगा।
सागर कुमार का यह कार्टून प्रशासन के गाल पर एक तमाचा है। यह तस्वीर चीख-चीख कर कह रही है कि “किताबों के बोझ तले अब बच्चे नहीं, बल्कि उनके पिता का कंधा दब रहा है।” यदि समय रहते इस ‘लूटतंत्र’ को नहीं रोका गया, तो स्कूल केवल डिग्री बांटने वाले व्यापारिक केंद्र बनकर रह जाएंगे और शिक्षा की मूल भावना दम तोड़ देगी।



