लैलूंगा में ‘जनसमस्या निवारण’ या ‘सरकारी पिकनिक’? अधिकारियों की बेरुखी ने उड़ाया ग्रामीणों का मजाक!…

लैलूंगा। प्रशासनिक संवेदनहीनता जब अपनी पराकाष्ठा पार कर ले, तो वह ‘जनसेवा’ नहीं बल्कि ‘जन-छलावा’ बन जाती है। आदिवासी अंचल लैलूंगा में आयोजित ताजा जनसमस्या निवारण शिविर इसका जीवंत प्रमाण बनकर उभरा है। जिसे जनता के दुखों का मरहम बनना था, वह शिविर आज अव्यवस्थाओं की भेंट चढ़ गया।
कुर्सी खाली, जनता बेहाल : ‘साहब’ नदारद हैं! – हैरानी की बात यह है कि जिस शिविर के नाम पर सरकारी खजाने से ताम-झाम किया गया, वहां मुख्य विभागों के जिम्मेदार अधिकारी अपनी हाजिरी लगाना भी भूल गए। ग्रामीण अपनी फटेहाल अर्जियां लेकर चिलचिलाती धूप में घंटों खड़े रहे, लेकिन समाधान देने वाली कुर्सियां खाली पड़ी रहीं।
बड़ा सवाल : क्या प्रशासन ने यह मान लिया है कि आदिवासी अंचल के लोगों की समस्याओं की कोई कीमत नहीं है?
शिक्षा विभाग की ‘घोर लापरवाही’ आई सामने – यह क्षेत्र जिला पंचायत उपाध्यक्ष एवं जिला शिक्षा समिति के सभापति दीपक सिदार का गृह क्षेत्र है। इसके बावजूद, जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) का शिविर से गायब रहना सीधे तौर पर उच्चाधिकारियों की अनुशासनहीनता और जनप्रतिनिधियों के प्रति अनादर को दर्शाता है। जब शिक्षा जैसे बुनियादी विभाग के मुखिया ही नदारद हों, तो बच्चों और शिक्षकों की समस्याओं का समाधान कौन करेगा?
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ और जनप्रतिनिधियों से ‘परहेज’ -प्रशासन की पारदर्शिता का आलम यह है कि इतने महत्वपूर्ण शिविर की सूचना न तो स्थानीय मीडिया को दी गई और न ही जनप्रतिनिधियों को।
- गोपनीयता या डर? आखिर प्रशासन ने इसे ‘गुप्त मिशन’ की तरह क्यों आयोजित किया?
- सूचना का अभाव : क्या अधिकारी जवाबदेही से बचने के लिए सूचनाएं छुपा रहे हैं?
जनता की मांग : फोटोबाजी बंद हो, काम शुरू हो! – नाराज ग्रामीणों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने दो टूक शब्दों में कहा है कि जनसमस्या निवारण शिविरों को महज ‘सरकारी औपचारिकता’ और ‘फोटो सेशन’ का जरिया न बनाया जाए। ग्रामीणों ने मांग की है कि लापरवाह अधिकारियों पर तत्काल कार्रवाई हो, अन्यथा यह आक्रोश सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर होगा।
लैलूंगा की यह घटना केवल एक शिविर की विफलता नहीं है, बल्कि यह उस जर्जर प्रशासनिक ढांचे की पोल खोलती है जहाँ अधिकारी खुद को जनता का सेवक नहीं, बल्कि ‘नवाब’ समझ बैठे हैं। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इन लापरवाह ‘कुर्सीधारियों’ पर चाबुक चलाता है या मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।




