महाघोटाला : मरवाही SDM कार्यालय में ‘अदृश्य’ NOC पर हुआ जमीन का डाइवर्सन, क्या फाइलों से साक्ष्य मिटा दिए गए?…

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। विशेष रिपोर्ट – मरवाही अनुभाग में राजस्व विभाग का एक ऐसा कारनामा सामने आया है जिसे सुनकर नियम-कानून के जानकार भी हैरान हैं। यह मामला ‘जादू’ जैसा है—जमीन कहीं और की, एनओसी (NOC) कहीं और की, और जब सबूत मांगा गया तो फाइल से दस्तावेज ही गायब! मामला ग्राम मड़ई की भूमि (खसरा नंबर 236/7, रकबा 2.023) के डाइवर्सन से जुड़ा है, जिसमें सीधे तौर पर तत्कालीन अधिकारियों और कर्मचारियों की कार्यप्रणाली पर भ्रष्टाचार की उंगलियां उठ रही हैं।

जमीन मड़ई में, मुनादी सेखवा में : यह खेल क्या है? – राजस्व नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए, ग्राम पंचायत मड़ई की जमीन का डाइवर्सन करने के लिए पड़ोस की पंचायत सेखवा में उद्घोषणा और मुनादी कराई गई। सवाल यह है कि क्या मड़ई पंचायत के विरोध के डर से जानबूझकर प्रक्रिया को दूसरी पंचायत में शिफ्ट किया गया? डाइवर्सन आदेश में सेखवा पंचायत का उल्लेख होना पूरी प्रक्रिया को प्रथम दृष्टया अवैध और संदिग्ध बनाता है।

‘गायब’ फाइल और कार्यालय का विरोधाभासी जवाब – सबसे चौंकाने वाला खुलासा तब हुआ जब आवेदक ने सूचना के अधिकार या नकल शाखा के माध्यम से डाइवर्सन प्रकरण में संलग्न NOC की प्रति मांगी।
- आदेश की कॉपी (संलग्न चित्र) : इसमें स्पष्ट लिखा है कि “ग्राम पंचायत सेखवा का अनापत्ति प्रमाण पत्र प्रकरण में संलग्न है” (बिंदु क्रमांक 24 पर घेरा)।
- नकल शाखा का जवाब : जब इसी NOC की प्रमाणित प्रति मांगी गई, तो लिखित जवाब मिला कि “फाइल में ग्राम पंचायत का NOC संलग्न नहीं है।”
बड़ा सवाल : अगर फाइल में NOC है ही नहीं, तो तत्कालीन SDM ने किस आधार पर आदेश में उसे ‘संलग्न’ बताया? क्या आदेश पारित करते समय फर्जीवाड़ा किया गया या बाद में फाइल से साक्ष्य मिटाने के लिए दस्तावेज चोरी कर लिए गए?
रसूख और सांठगांठ का त्रिकोण – मामले में भू-स्वामी बेबीलता और उनके पति शंकर प्रजापति (शिक्षक) का नाम प्रमुखता से आ रहा है। स्थानीय गलियारों में चर्चा है कि शिक्षक महोदय के रसूख और विभाग में पैठ के चलते नियमों को ताक पर रखकर यह डाइवर्सन कराया गया। आरोप तो यहां तक हैं कि विवादित जमीनों का डाइवर्सन कराकर बैंकों से मोटा लोन लेने का सिंडिकेट सक्रिय है।
मड़ई सरपंच का बयान: “NOC दी ही नहीं” – ग्राम पंचायत मड़ई के सरपंच का साफ कहना है कि भूमि विवादित होने के कारण पंचायत ने कभी अनापत्ति दी ही नहीं। ऐसे में बिना संबंधित पंचायत की सहमति के कृषि भूमि को आवासीय या व्यावसायिक उद्देश्य के लिए डाइवर्ट करना एक बड़े राजस्व अपराध की श्रेणी में आता है।
सिस्टम से तीखे सवाल :
- कलेक्टर महोदय ध्यान दें: क्या मरवाही SDM कार्यालय में फाइलों के साथ छेड़छाड़ करना आम बात है?
- दोषी कौन? आदेश लिखने वाले बाबू, जांच करने वाले राजस्व निरीक्षक या अंतिम मुहर लगाने वाले पीठासीन अधिकारी?
- रिकवरी और निरस्तीकरण: क्या प्रशासन इस संदिग्ध डाइवर्सन को तत्काल निरस्त कर दोषियों पर FIR दर्ज कराएगा?
यह मामला केवल एक जमीन के टुकड़े का नहीं है, बल्कि सरकारी दस्तावेजों की विश्वसनीयता का है। यदि ‘सत्य प्रतिलिपि’ देने वाली शाखा कह रही है कि दस्तावेज गायब है और ‘आदेश’ कह रहा है कि दस्तावेज मौजूद है, तो साफ है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है। ग्रामीण अब इस मामले में उच्चस्तरीय जांच और ‘कूटरचना’ (Forgery) की धाराओं के तहत कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।




