लैलूंगा के चोरंगा में स्कूल बना ‘खेत’, हेडमास्टर ने बच्चों को बनाया ‘मजदूर’…

- शिक्षा के मंदिर का अपमान; कलम की जगह बच्चों के हाथों में थमाया फावड़ा…क्या अब गिरेगी गाज?…
लैलूंगा। शिक्षा के अधिकार और सुनहरे भविष्य के दावों के बीच एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जो रोंगटे खड़े कर देने वाली है। लैलूंगा विकासखंड के ग्राम चोरंगा स्थित प्राथमिक शाला में बच्चों को ‘क ख ग घ’ सिखाने के बजाय उनसे आलू की खेती कराई जा रही है। स्कूल परिसर, जिसे ज्ञान का केंद्र होना चाहिए था, उसे हेडमास्टर ने अपनी निजी जागीर समझकर खेती के मैदान में तब्दील कर दिया है।
शर्मनाक : पढ़ाई के वक्त बच्चों से चलवाया जा रहा फावड़ा – प्रधान पाठक संजय उरांव पर लगे आरोप केवल लापरवाही के नहीं, बल्कि बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ के हैं।
- खेत बने क्लासरूम : स्कूल के समय में बच्चों से आलू की निंदाई और गुड़ाई का काम लिया जा रहा है।
- गायब रहते हैं गुरुजी : ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि हेडमास्टर अक्सर स्कूल से नदारद रहते हैं, जिससे पढ़ाई का स्तर पूरी तरह गिर चुका है।
- पालकों का फूटा गुस्सा : बच्चों के हाथों में किताब की जगह फावड़ा देखकर अभिभावकों में भारी रोष व्याप्त है।
पंचायत की दो टूक : “तत्काल बर्खास्त हो हेडमास्टर” – ग्राम पंचायत और ग्रामीणों ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए मोर्चा खोल दिया है। मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) को सौंपे गए लिखित शिकायत पत्र में स्पष्ट मांग की गई है कि :
- संजय उरांव को पद से तत्काल हटाया जाए।
- बच्चों के मानसिक और शारीरिक शोषण के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए।
जांच पर ‘संदेह’ का साया – हालांकि खंड शिक्षा विभाग ने जांच दल का गठन कर दिया है और रोशनी कुजूर (प्राचार्य) व देहरी लाल पैंकरा (समन्वयक) को 7 दिनों के भीतर रिपोर्ट देने का निर्देश दिया है, लेकिन ग्रामीणों को यह ‘कागजी खानापूर्ति’ लग रही है।
बड़ा सवाल: शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि जांच प्रक्रिया में उन्हें शामिल नहीं किया गया और न ही कोई सूचना दी गई। क्या प्रशासन इस गंभीर मामले में लीपापोती करने की कोशिश कर रहा है?
न्याय या केवल आश्वासन? – ग्रामीणों ने प्रशासन को साफ चेतावनी दी है कि यदि जांच निष्पक्ष नहीं हुई और दोषी प्रधान पाठक पर सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो वे चुप नहीं बैठेंगे। अब देखना यह है कि क्या शासन इन बच्चों को खेतों से निकालकर वापस क्लासरूम तक ला पाता है या व्यवस्था ऐसे ही ‘मजदूर’ पैदा करती रहेगी।
विशेष संवाददाता की रिपोर्ट




