घरघोड़ा का ‘स्पेशल कोटे’ वाला विकास : खाकी की गोद में धधक रही हैं मौत की भट्टियां!…

घरघोड़ा (विशेष विश्लेषण) : विकास की बयार बहे न बहे, लेकिन घरघोड़ा के गांवों में कच्ची महुए की खुशबू (सॉरी, बदबू) जरूर परवान चढ़ रही है। जिस क्षेत्र को कृषि और मजदूरी के लिए जाना जाना चाहिए था, उसे सिस्टम ने बड़े प्यार से ‘अवैध शराब की राजधानी’ के रूप में गोद ले लिया है। आलम यह है कि सरकारी विभागों की मेहरबानी से अब घर-घर ‘मिनी शराब फैक्ट्री’ का उद्घाटन हो चुका है।
हफ्ता वसूली का ‘इंश्योरेंस’ और बेखौफ धंधा : कहते हैं कानून के हाथ लंबे होते हैं, लेकिन घरघोड़ा में शायद कानून ने अपने हाथ ‘काली कमाई’ की चादर में लपेट लिए हैं। स्थानीय पुलिस, आबकारी विभाग और गांव के स्वयंभू मुखियाओं की ‘सेवा’ में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही। जब जेबें गरम हों, तो आंखों पर पट्टी बंधना लाजमी है। शायद इसीलिए जिम्मेदार अधिकारी इन भट्टियों के धुएं को ‘पवित्र हवन’ समझकर नजरअंदाज कर रहे हैं।
मजदूरों का ‘इंटरनेशनल’ टैलेंट : लूट से लेकर डकैती तक – पलायन यहां की नियति है, पर अब यह पलायन ‘हुनर’ लेकर लौट रहा है। दलालों के जरिए बाहर गए मजदूर अब अन्य प्रांतों के अपराधियों के साथ मिलकर लूट, डकैती और नकली नोटों का ऐसा ‘स्टार्टअप’ चला रहे हैं, जिसे देखकर बड़े-बड़े बिजनेसमैन भी शरमा जाएं। घरघोड़ा अब केवल ब्लॉक नहीं रहा, बल्कि अपराधों का एक ऐसा ‘मॉल’ बन गया है जहां हर तरह का जुर्म डिस्काउंट पर उपलब्ध है।
लाशों का इंतजार कर रहा है प्रशासन?
व्यंग्य की मार : शायद जिला प्रशासन को ‘सरई मदरा’ वाले कांड की यादें धुंधली पड़ गई हैं। ऐसा लगता है कि साहब लोग तब तक फाइल नहीं खोलेंगे, जब तक इन भट्टियों से निकली जहरीली शराब किसी गरीब की चिता की आग न बन जाए। क्या प्रशासन ने तय कर लिया है कि राजस्व की हानि और मासूमों की जान, साहबों की ‘ऊपरी कमाई’ से छोटी है?
घरघोड़ा के इस ‘ब्लैक बिजनेस’ की खास बातें :
- होम डिलीवरी : जरकिनों और डिब्बों में भरकर मौत का सामान आपके दरवाजे तक, और पुलिस की पीसीआर वैन शायद रास्ता दिखाने में व्यस्त है।
- प्रतिस्पर्धा का तड़का : शराब माफियाओं में इतनी होड़ है कि कभी भी ‘गैंगवार’ का मनोरंजन जनता को देखने मिल सकता है।
- राजस्व की बलि : सरकार को चूना लगाकर, अपनी तिजोरी भरना ही यहाँ का ‘नया नियम’ है।
अंतिम चेतावनी : अगर प्रशासन का यही ‘गांधीवादी’ रवैया (बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, और पैसे लो) जारी रहा, तो घरघोड़ा की ये भट्टियां केवल शराब नहीं, बल्कि पूरे समाज की नैतिकता को जलाकर राख कर देंगी।




