विशेष रिपोर्ट : रायगढ़ RTO में ‘सूचना के अधिकार’ का गला घोंटा जा रहा? भ्रष्टाचार की फाइलों पर ‘अस्पष्टता’ का पर्दा!…

रायगढ़। पारदर्शिता का दम भरने वाले सरकारी तंत्र की पोल उस वक्त खुल गई, जब जिला परिवहन कार्यालय (RTO) रायगढ़ ने सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मांगी गई जानकारी को ‘अस्पष्ट’ बताकर ठंडे बस्ते में डाल दिया। विभाग के इस पैंतरे ने एक बड़े सवाल को जन्म दे दिया है— क्या आरटीओ कार्यालय में ड्राइविंग लाइसेंस के खेल में कोई बड़ा सिंडिकेट काम कर रहा है जिसे उजागर होने से बचाने के लिए ‘नियमों’ की ढाल बनाई जा रही है?

खबर का सिरा : पारदर्शिता से विभाग को ‘परहेज’ क्यों? – मामला आवेदक द्वारा मांगी गई एक आरटीआई से जुड़ा है। उन्होंने 1 अप्रैल 2023 से अब तक जारी किए गए ड्राइविंग लाइसेंसों से संबंधित संपूर्ण नस्तियों (Note-sheets), पत्राचार, जांच रिपोर्ट और संलग्न दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां मांगी थीं।
हैरानी की बात यह है कि विभाग ने पत्र क्रमांक 1459/जि.प.अ./2026 के जरिए जवाब देते हुए इसे यह कहकर खारिज कर दिया कि जानकारी “विशिष्ट” (Specific) नहीं है। सवाल यह है कि जब आवेदक ने स्पष्ट तारीख (1 अप्रैल 2023 से वर्तमान तक) और स्पष्ट श्रेणी (ड्राइविंग लाइसेंस फाइलें) बताई है, तो आरटीओ को इसमें ‘अस्पष्टता’ कहाँ नजर आ रही है?
भ्रष्टाचार की बू? इन 5 तीखे सवालों के घेरे में RTO रायगढ़ :
- नोटशीट से डर क्यों? नोटशीट वह सरकारी दस्तावेज होता है जहाँ अधिकारी अपनी राय और आपत्तियां दर्ज करते हैं। क्या आरटीओ को डर है कि इन नोटशीटों के सार्वजनिक होने से लाइसेंस जारी करने में हुई अनियमितताएं और ‘लेन-देन’ का खेल उजागर हो जाएगा?
- नियमों की गलत व्याख्या? आरटीआई अधिनियम की धारा 6(1)(ख) का हवाला देना क्या केवल एक बहाना है? कानून कहता है कि यदि आवेदन स्पष्ट न हो, तो पीआईओ (PIO) का कर्तव्य है कि वह आवेदक की सहायता करे, न कि सीधे आवेदन निरस्त कर दे।
- जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने में हिचक : ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने से पहले होने वाली जांच रिपोर्टों को छिपाना क्या यह संकेत नहीं देता कि कई लाइसेंस बिना भौतिक सत्यापन (Physical Verification) के ही बांट दिए गए हैं?
- दस्तावेजों का अंबार या जवाबदेही से बचाव? विभाग का तर्क हो सकता है कि डेटा बहुत बड़ा है। लेकिन क्या डेटा बड़ा होना सूचना छिपाने का वैध आधार हो सकता है? विभाग ‘रिकॉर्ड निरीक्षण’ (Record Inspection) का विकल्प भी दे सकता था, जो उसने नहीं दिया।
- किसके संरक्षण में चल रहा खेल? आरटीओ रायगढ़ की इस ‘ना-नुकर’ के पीछे आखिर वो कौन से रसूखदार चेहरे हैं जिनके इशारे पर सूचना के अधिकार जैसे सशक्त कानून को बौना बनाया जा रहा है?
जनता की गाढ़ी कमाई और दलालों का नेटवर्क – आम चर्चा है कि आरटीओ कार्यालयों में बिना दलालों के काम होना आज भी एक चुनौती है। ऐसे में जब कोई जागरूक नागरिक फाइलों तक पहुँचने की कोशिश करता है, तो सिस्टम ‘अस्पष्टता’ और ‘तकनीकी खामियों’ का रोड़ा अटका देता है। रायगढ़ आरटीओ का यह जवाब सीधे तौर पर लोकतंत्र के चौथे स्तंभ और आम जनता की जागरूकता को चुनौती है।
अब कलेक्टर की ‘अदालत’ में होगी अग्निपरीक्षा – विभाग के इस गैर-जिम्मेदाराना जवाब के बाद अब मामला प्रथम अपीलीय अधिकारी (जिला कलेक्टर, रायगढ़) के पास जाने की तैयारी में है। जिले के मुखिया से यह उम्मीद है कि वे विभाग की इस तानाशाही पर लगाम कसेंगे और फाइलों को सार्वजनिक कर दूध का दूध और पानी का पानी करेंगे।
बड़ी चेतावनी : यदि विभाग सूचना देने में इसी तरह की हठधर्मिता दिखाता रहा, तो मामला राज्य सूचना आयोग तक जाएगा, जहाँ पीआईओ पर भारी जुर्माने का भी प्रावधान है।




