रायगढ़

तमनार का ‘तालिबानी’ न्याय : क्या छत्तीसगढ़ में अब कानून की जगह ‘भीड़ तंत्र’ का राज है?…

रायगढ़ ब्यूरो। छत्तीसगढ़ के तमनार से उठी आक्रोश की चिंगारी ने अब एक ऐसे ‘सिस्टम’ को बेनकाब कर दिया है, जो कानून की किताब छोड़कर सड़कों पर ‘कबीलाई इंसाफ’ करने पर उतारू है। पहली तस्वीर में एक महिला पुलिसकर्मी का फटी वर्दी में चीखना शर्मनाक था, तो दूसरी तस्वीर में आरोपी को जूतों की माला पहनाकर घुमाना लोकतंत्र का ‘संस्थानिक कत्ल’ है।

वर्दी का चीरहरण और फिर व्यवस्था का तमाशा – घटना की शुरुआत उस शर्मनाक मंजर से हुई जहाँ एक महिला पुलिसकर्मी भीड़ के वहशीपन का शिकार हुई। वर्दी पर हाथ डालना सीधे राज्य की सत्ता को चुनौती थी। लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने सभ्य समाज के माथे पर कलंक लगा दिया। जिस आरोपी को अदालत के कटघरे में खड़ा होना चाहिए था, उसे पुलिस की मौजूदगी में ‘चिड़ियाघर का जानवर’ बनाकर सड़कों पर नचाया गया।

बदला या न्याय? पुलिस और अपराधियों में अब अंतर क्या? – ​भारी सुरक्षा घेरा, कैमरों की फ्लैशलाइट, गूंजते नारे और फूटते पटाखे… यह किसी अपराधी की गिरफ्तारी नहीं, बल्कि एक सुनियोजित ‘पब्लिक ह्यूमिलिएशन शो’ था। प्रशासन ने यह संदेश देने की कोशिश की कि “वर्दी को छुओगे तो बर्बाद कर दिए जाओगे”, लेकिन इस प्रक्रिया में प्रशासन खुद यह भूल गया कि वह ‘संविधान का रक्षक’ है, किसी गिरोह का हिस्सा नहीं।

“जब खाकी वर्दी पहने लोग खुद ही जज और जल्लाद बन जाएं, तो समझ लीजिए कि लोकतंत्र की सांसें उखड़ रही हैं।”

सत्ता का ‘शॉर्टकट’ न्याय : कुणाल शुक्ला ने खटखटाया NHRC का दरवाजा – ​सामाजिक कार्यकर्ता कुणाल शुक्ला ने इस मामले में तीखा हमला बोलते हुए इसे मानवाधिकारों की धज्जियां उड़ाना करार दिया है। उन्होंने NHRC में शिकायत दर्ज कराते हुए सवाल किया— “अगर जूतों की माला पहनाना और चेहरा काला करना ही सजा है, तो करोड़ों की लागत से बनी अदालतें और संविधान की किताबें क्या सिर्फ सजावट के लिए हैं?”

खौफ की राजनीति बनाम कानून का राज – तमनार की घटना ने साफ कर दिया है कि राज्य अब गुस्से में ‘भीड़ की भाषा’ बोलने लगा है। जब कानून की रक्षा करने वाले हाथ ही मानवाधिकारों का गला घोंटने लगें, तो अपराधी और रक्षक के बीच की रेखा मिट जाती है। यह ‘खौफ’ पैदा करने का तरीका हो सकता है, लेकिन यह ‘न्याय’ कतई नहीं है।

बड़े सवाल जो तमनार कांड ने खड़े किए :

  • क्या पुलिस अब अदालती कार्यवाही पर भरोसा खो चुकी है?
  • क्या जनता के गुस्से को शांत करने के लिए ‘मध्यकालीन बर्बरता’ ही एकमात्र रास्ता बचा है?
  • महिला पुलिसकर्मी के साथ हुई हिंसा का बदला क्या कानून को हाथ में लेकर लिया जाएगा?

पूर्व में प्रकाशित खबर :

Admin : RM24

Investigative Journalist & RTI Activist

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