जज के खिलाफ FIR दर्ज करना पड़ा भारी! बिलासपुर में सरकंडा TI प्रदीप आर्य लाइन अटैच, न्यायिक महकमे की नाराजगी के बाद पुलिस विभाग में हलचल…

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर में एक न्यायिक अधिकारी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का मामला अब पुलिस विभाग के लिए बड़ा प्रशासनिक और कानूनी सवाल बन गया है। महासमुंद कुटुंब न्यायालय में पदस्थ न्यायाधीश प्रफुल्ल कुमार सोनवानी के खिलाफ सरकंडा थाने में एफआईआर दर्ज होने के बाद उठे विवाद के बीच थाना प्रभारी प्रदीप आर्य को तत्काल प्रभाव से लाइन अटैच कर दिया गया है। उनकी जगह निरीक्षक नरेश चौहान को सरकंडा थाने की कमान सौंपी गई है।
एसएसपी रजनेश सिंह के इस आदेश ने पुलिस महकमे में हलचल बढ़ा दी है। आधिकारिक तौर पर कार्रवाई के पीछे प्रशासनिक कारण बताए गए हैं, लेकिन घटनाक्रम का समय और इससे पहले न्यायिक अधिकारियों की ओर से जताई गई आपत्ति कई सवाल खड़े कर रही है। सवाल यह भी है कि क्या एक न्यायिक अधिकारी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने से पहले जरूरी संस्थागत प्रक्रिया का पालन किया गया था?
जन्मदिन की पार्टी, 45 मिनट तक नगाड़े और आतिशबाजी, फिर आधी रात को बवाल – पूरा घटनाक्रम 31 अक्टूबर 2026 की रात का है। महासमुंद कुटुंब न्यायालय में पदस्थ न्यायाधीश प्रफुल्ल कुमार सोनवानी अपने परिवार के साथ बिलासपुर के राजकिशोर नगर स्थित जूनियर एमआईजी क्षेत्र में अपने ससुराल आए हुए थे।
हरिभूमि की प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, रात करीब 11 बजे परिवार के सदस्य घर में सोने चले गए थे। इसी दौरान पड़ोस में जन्मदिन का जश्न शुरू हुआ। तेज आवाज में नगाड़े बजाए जा रहे थे और आतिशबाजी की जा रही थी। रिपोर्ट में दावा है कि करीब 45 मिनट तक शोर-शराबा जारी रहा।
इससे परेशान होकर न्यायाधीश प्रफुल्ल सोनवानी घर से बाहर निकले और युवकों से नगाड़े बंद करने तथा आतिशबाजी रोकने को कहा। बताया गया कि वहां मौजूद लोगों ने इसे लेकर आपत्ति जताई और देखते ही देखते विवाद बढ़ गया।
जज का आरोप : प्रॉपर्टी डीलर और साथियों ने परिवार के साथ की मारपीट – न्यायाधीश की शिकायत के मुताबिक, जन्मदिन मना रहे प्रॉपर्टी डीलर अभय बरुआ और उसके साथियों ने उनके साथ गाली-गलौज और मारपीट की। बीच-बचाव करने पहुंचीं उनकी पत्नी आकांक्षा सोनवानी, साले अभिषेक भारद्वाज, सास नीरा भारद्वाज और साले की पत्नी गुरप्रीत भारद्वाज के साथ भी मारपीट और धमकी देने के आरोप लगाए गए।
पुलिस ने न्यायाधीश की शिकायत पर प्रॉपर्टी डीलर अभय बरुआ और उसके अन्य साथियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं में अपराध दर्ज किया।
दूसरा पक्ष भी पहुंचा थाने, जज और परिजनों के खिलाफ भी FIR – मामले ने उस समय अप्रत्याशित मोड़ ले लिया, जब दूसरे पक्ष की ओर से भी पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई।
रिपोर्ट के अनुसार, मगरपारा-अंबेडकर नगर निवासी विनय वैद्य ने शिकायत में आरोप लगाया कि जन्मदिन समारोह के दौरान प्रफुल्ल सोनवानी, उनकी पत्नी आकांक्षा सोनवानी और अभिषेक भारद्वाज ने उसके साथ मारपीट की तथा जान से मारने की धमकी दी।
पुलिस ने विनय वैद्य की शिकायत पर न्यायाधीश प्रफुल्ल सोनवानी, उनकी पत्नी आकांक्षा और अभिषेक भारद्वाज के खिलाफ भी अपराध क्रमांक 1596/26 दर्ज किया।
यहीं से पूरा मामला सामान्य मारपीट के विवाद से निकलकर न्यायिक अधिकारी के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने की प्रक्रिया पर सवालों के घेरे में आ गया।
आखिर न्यायाधीश के खिलाफ FIR दर्ज करने पर क्यों उठे सवाल? – न्यायाधीश के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने के बाद न्यायिक अधिकारियों की ओर से आपत्ति जताए जाने की खबरें सामने आईं। सवाल उठाया गया कि क्या पुलिस ने एक सेवारत न्यायिक अधिकारी के खिलाफ मामला दर्ज करने से पहले संबंधित संस्थागत प्रक्रिया और आवश्यक कानूनी पहलुओं की जांच की थी?
कुछ मीडिया रिपोर्टों में वकीलों के हवाले से हाईकोर्ट की पूर्व अनुमति की आवश्यकता का दावा किया गया। वहीं, सरकंडा पुलिस की ओर से यह सफाई सामने आई कि एफआईआर दर्ज करने वाले अधिकारी को यह जानकारी नहीं थी कि संबंधित आरोपी न्यायाधीश हैं।
यहां एक कानूनी पहलू भी महत्वपूर्ण है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 218 न्यायाधीशों और कुछ लोक सेवकों को उनके आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन से जुड़े कथित अपराधों के मामले में अभियोजन से संबंधित संरक्षण प्रदान करती है। हालांकि, यह प्रावधान प्रत्येक निजी विवाद या व्यक्तिगत घटना में एफआईआर दर्ज करने पर स्वतः लागू होने वाला सामान्य प्रतिबंध नहीं है। इस मामले में अनुमति या प्रक्रिया की वास्तविक आवश्यकता का निर्धारण घटना की प्रकृति और लागू न्यायिक निर्देशों के आधार पर ही किया जा सकता है।
इसलिए मूल सवाल यह है कि पुलिस ने शिकायतों की जांच और एफआईआर दर्ज करने के दौरान न्यायिक अधिकारी की पदगत स्थिति को ध्यान में रखते हुए कौन-सी प्रक्रिया अपनाई?
SSP के लौटते ही कार्रवाई, प्रदीप आर्य लाइन अटैच – इस पूरे घटनाक्रम के बाद सरकंडा थाना प्रभारी प्रदीप आर्य पर कार्रवाई की खबर सामने आई। समय शिखर न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, घटना के समय एसएसपी रजनेश सिंह अवकाश पर थे। उनके वापस लौटने के बाद पूरे घटनाक्रम की जानकारी ली गई और संबंधित पुलिस अधिकारियों से जवाब मांगे जाने की बात भी सामने आई है।
इसके बाद प्रदीप आर्य को लाइन अटैच कर दिया गया और निरीक्षक नरेश चौहान को सरकंडा थाने की जिम्मेदारी सौंप दी गई।
हालांकि, एसएसपी के आधिकारिक आदेश में लाइन अटैचमेंट का कारण प्रशासनिक बताया गया है। पुलिस विभाग ने सार्वजनिक रूप से यह पुष्टि नहीं की है कि यह कार्रवाई सीधे न्यायाधीश के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के कारण की गई है।
अब पुलिस विभाग के सामने कई बड़े सवाल – इस घटनाक्रम ने पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं।
- क्या न्यायाधीश के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने से पहले उनकी पदगत स्थिति और संबंधित कानूनी प्रावधानों की जांच की गई थी?
- क्या दोनों पक्षों की शिकायतों पर कार्रवाई करते समय समान कानूनी प्रक्रिया अपनाई गई?
- क्या वरिष्ठ अधिकारियों को न्यायिक अधिकारी के खिलाफ एफआईआर दर्ज किए जाने की जानकारी दी गई थी?
- क्या इस पूरे प्रकरण में किसी स्तर पर प्रक्रियागत चूक हुई?
- टीआई प्रदीप आर्य को लाइन अटैच करने के पीछे वास्तविक प्रशासनिक कारण क्या हैं?
फिलहाल इन सवालों के आधिकारिक जवाब सामने आना बाकी हैं।
मामला सिर्फ एक टीआई के तबादले का नहीं, पुलिस की जवाबदेही का भी है – बिलासपुर का यह घटनाक्रम पुलिस और न्यायपालिका के बीच संस्थागत मर्यादा, कानून के पालन और जवाबदेही के महत्व को सामने लाता है। एक तरफ न्यायाधीश और उनके परिवार के साथ कथित मारपीट का मामला है, तो दूसरी तरफ दूसरे पक्ष की शिकायत पर न्यायाधीश और उनके परिजनों के खिलाफ दर्ज एफआईआर की प्रक्रिया पर उठे सवाल हैं।
कानून की नजर में शिकायतकर्ता या आरोपी की सामाजिक अथवा संस्थागत हैसियत से ऊपर निष्पक्ष जांच और विधिसम्मत प्रक्रिया होनी चाहिए। लेकिन जब किसी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ मामला दर्ज होता है, तब संबंधित कानूनी सुरक्षा और संस्थागत प्रक्रियाओं की अनदेखी का आरोप भी गंभीरता से जांचा जाना जरूरी है।
अब निगाहें पुलिस विभाग की अगली कार्रवाई पर हैं। क्या इस पूरे मामले की विभागीय जांच होगी? क्या एफआईआर दर्ज करने की प्रक्रिया की समीक्षा की जाएगी? और क्या पुलिस विभाग स्पष्ट करेगा कि प्रदीप आर्य को लाइन अटैच करने के पीछे वास्तविक वजह क्या थी?
इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि यह महज एक प्रशासनिक फेरबदल था या पूरे घटनाक्रम में किसी बड़ी प्रक्रियागत चूक की जांच की शुरुआत।
ब्यूरो रिपोर्ट | बिलासपुर, छत्तीसगढ़




