विशेष कटाक्ष : छत्तीसगढ़ में ‘टाइम मशीन’ बना सूचना आयोग ; 2024 की अर्जी लगाइए और सीधे 2028 के ‘अमृत काल’ में पहुंचिए!…

रायपुर: खोखले सुशासन की ग्राउंड रिपोर्ट –
छत्तीसगढ़ : अगर आप सोचते हैं कि सूचना का अधिकार भ्रष्टाचार के खिलाफ एक हथियार है, तो आप गलत हैं। छत्तीसगढ़ में यह ‘धैर्य की परीक्षा’ देने वाला एक आध्यात्मिक मार्ग बन चुका है। राज्य सूचना आयोग ने एक ऐसा करिश्मा कर दिखाया है जिसे सुनकर नासा (NASA) भी चकरा जाए – यहाँ न्याय की गाड़ी ‘सांय-सांय’ नहीं, बल्कि ‘ठहर-ठहर’ कर चलती है।

हाल ही में सामने आया प्रकरण क्रमांक A/3784/2024 इसका जीता-जागता प्रमाण है, जहाँ पारदर्शिता की अर्थी बड़े धूमधाम से निकाली जा रही है।
तारीखों का मायाजाल: न्याय या ‘पुनर्जन्म’ का इंतजार? -दस्तावेजों के मुताबिक, रायगढ़ के एक जागरूक नागरिक कार्तिक राम पोर्ते ने 29 मई 2024 को द्वितीय अपील दायर की। अब आयोग का ‘चमत्कार’ देखिये:
- प्रथम सुनवाई : 23 दिसंबर 2025 (यानी 573 दिन बाद साहब को फुर्सत मिलेगी!)
- तर्क और जवाब : 14 जून 2028 (यानी पूरे 1478 दिन बाद!)
व्यंग्य यह है कि जितने समय में एक बच्चा इंजीनियरिंग पूरी कर लेता है, उतने समय में छत्तीसगढ़ सूचना आयोग यह तय करेगा कि पंचायत की जानकारी देनी है या नहीं। क्या आयोग यह मान कर चल रहा है कि आवेदक और विपक्षी अधिकारी दोनों ही ‘अमरता’ का वरदान लेकर आए हैं?
‘सांय-सांय’ सरकार का सुस्त आयोग – प्रदेश में शोर है कि ‘सांय-सांय’ काम हो रहा है। लेकिन सूचना आयोग में फाइलें कछुए की पीठ पर बैठकर चल रही हैं। 2028 की तारीख देकर आयोग ने स्पष्ट कर दिया है कि वह ‘सूचना का अधिकार’ नहीं, बल्कि ‘सूचना को दफनाने का अधिकार’ चला रहा है।
व्यंग्य : मुख्यमंत्री जी, आपके राज में भ्रष्टाचार की जांच इतनी “तेज” है कि जब तक जवाब आएगा, तब तक आरोपी अधिकारी रिटायर होकर पोते-पोतियों के साथ तीर्थ यात्रा पर निकल चुका होगा।
भ्रष्टाचार के लिए ‘सुरक्षित गलियारा’ (Safe Passage) – जब एक पंचायत सचिव को पता हो कि उसकी चोरी पकड़ने वाली फाइल पर सुनवाई 4 साल बाद होगी, तो वह डरेगा क्यों? वह तो उत्सव मनाएगा!
- साक्ष्य मिटाने का मौका : 4 साल में तो कागज दीमक खा जाते हैं, आयोग ने अधिकारियों को सबूत नष्ट करने के लिए ‘गोल्डन पीरियड’ दे दिया है।
- कांग्रेस राज बनाम वर्तमान : जनता चटकारे लेकर कह रही है- “साहब, वो (कांग्रेस) कम से कम 6 महीने में तो रफा-दफा करते थे, आपने तो न्याय को ही पंचवर्षीय योजना बना दिया!”
आयोग के ‘सूरमाओं’ से कुछ तीखे सवाल :
- सवाल : क्या आयोग के कैलेंडर में 2024 के बाद सीधे 2028 आता है? बीच के साल क्या ‘भ्रष्टाचार विश्राम वर्ष’ घोषित कर दिए गए हैं?
- सवाल : क्या यह तारीखें इसलिए दी जा रही हैं ताकि आवेदक थक जाए, हार मान ले या ‘सिस्टम’ से समझौता कर ले?
- सवाल : क्या सूचना आयुक्तों की सैलरी भी उन्हें 4 साल बाद ही दी जानी चाहिए, ताकि उन्हें ‘इंतजार’ का मीठा दर्द महसूस हो?
लोकतंत्र का सबसे महंगा मजाक – छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग अब केवल एक ‘सेवानिवृत्त अधिकारियों का क्लब’ बनकर रह गया है, जहाँ फाइलों पर धूल जमाना ही मुख्य पेशा है। रायगढ़ के कार्तिक राम पोर्ते का यह दस्तावेज़ पूरे सिस्टम के चेहरे पर कालिख पोतने के लिए पर्याप्त है।
अगर 2024 की अपील पर 2028 में सुनवाई होगी, तो बेहतर है कि आयोग के दफ्तर के बाहर एक बोर्ड टांग दिया जाए—“यहाँ न्याय की उम्मीद लेकर न आएं, यहाँ केवल तारीखें मुफ़्त मिलती हैं।”
सावधान रहें : अगर आप आज RTI लगा रहे हैं, तो अपने पोते का नाम भी उसमें लिखवा दें, क्योंकि जानकारी उसे ही मिलने वाली है!



