महाशक्ति बनाम ‘दीदी : कोलकाता की सड़कों पर संवैधानिक टकराव का नया अध्याय…

ब्यूरो रिपोर्ट। पश्चिम बंगाल की राजनीति में आज वह हुआ जिसकी कल्पना शायद दिल्ली के गलियारों में किसी ने नहीं की थी। कोलकाता की सड़कों पर आज कानून की दो धाराओं और दो ताकतों के बीच ऐसा ‘पावर प्ले’ देखने को मिला, जिसने देश के संघीय ढांचे की चूल्हें हिला दी हैं। इसे टीएमसी कार्यकर्ताओं द्वारा “बंगाल की अस्मिता” का बचाव कहा जा रहा है, तो राजनीतिक पंडित इसे केंद्र और राज्य के बीच “अघोषित युद्ध” की संज्ञा दे रहे हैं।
क्या है पूरा घटनाक्रम? – कोलकाता स्थित तृणमूल कांग्रेस (TMC) के आईटी सेल पर जब प्रवर्तन निदेशालय (ED) की टीम ने छापा मारा, तो उन्हें अंदाजा नहीं था कि मुकाबला केवल कागजों से नहीं, बल्कि ममता बनर्जी के ‘फायर ब्रांड’ तेवरों से होगा।
- घेराबंदी का चक्रव्यूह : जैसे ही ED की कार्रवाई शुरू हुई, देखते ही देखते 25,000 टीएमसी कार्यकर्ताओं और करीब 2000 हथियारबंद राज्य पुलिस के जवानों ने पूरे इलाके को छावनी में तब्दील कर दिया।
- फोर्स बनाम फोर्स : इतिहास में शायद पहली बार ऐसा हुआ जब केंद्रीय सुरक्षा बलों के सामने राज्य की सशस्त्र पुलिस दीवार बनकर खड़ी हो गई। 100 गाड़ियों के काफिले के साथ खुद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मोर्चे की कमान संभाली।
- फाइलों पर ‘कब्जा’ : चश्मदीदों और रिपोर्ट्स के मुताबिक, ममता बनर्जी ने स्वयं बिल्डिंग के भीतर प्रवेश कर ED की कार्रवाई को न केवल रोका, बल्कि महत्वपूर्ण फाइलों और कंप्यूटरों को अपने संरक्षण में ले लिया।
“शक्ति प्रदर्शन” या “संवैधानिक संकट”? – प्रेस वार्ता के दौरान ममता बनर्जी के तेवर बेहद तीखे थे। उन्होंने साफ कर दिया कि अब “बर्दाश्त की सीमा पार हो चुकी है।”
“यह लड़ाई अब आमने-सामने की है। बंगाल को डराने की कोशिश करने वालों को अब उसी की भाषा में जवाब मिलेगा।” — ममता बनर्जी
दिलचस्प बात यह रही कि इतनी भारी भीड़ और तनाव के बावजूद किसी भी अधिकारी के साथ शारीरिक हिंसा की खबर नहीं है। इसे ‘ताकत के खिलाफ ताकत’ दिखाने की रणनीति माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह संदेश सीधे तौर पर प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के लिए था कि बंगाल की धरती पर केंद्रीय एजेंसियों का “एकतरफा राज” नहीं चलेगा।
विपक्ष और जनमानस की प्रतिक्रिया – सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में इस घटना को लेकर बहस छिड़ गई है:
- क्षेत्रीय गौरव : समर्थकों का तर्क है कि बंगाली, पंजाबी और तमिल जैसी कौमें स्वाभिमान से समझौता नहीं करतीं।
- कांग्रेस पर तंज : चर्चा यह भी है कि यदि कांग्रेस ने भी इसी तरह की आक्रामक राजनीति दिखाई होती, तो केंद्र की कार्यप्रणाली अलग होती।
- कानूनी सवाल : क्या एक मुख्यमंत्री का केंद्रीय जांच एजेंसी के काम में इस तरह हस्तक्षेप करना संवैधानिक रूप से सही है? यह सवाल अब सुप्रीम कोर्ट तक जा सकता है।
आर-पार की जंग : आज की घटना ने स्पष्ट कर दिया है कि 2026 की राजनीतिक बिसात पर ममता बनर्जी ने ‘डिफेंस’ छोड़कर ‘अटैक’ की मुद्रा अपना ली है। हाथ में फाइल थामे ममता बनर्जी की वह तस्वीर आने वाले चुनावों में विपक्ष का सबसे बड़ा हथियार बनने जा रही है। यह महज एक रेड नहीं थी, बल्कि दिल्ली को यह बताने की कोशिश थी कि “खेला होबे” अब सिर्फ नारा नहीं, हकीकत है।




