27 दिन बाद खुदाई में निकली भालू की लाश, वन विभाग की ‘गोपनीय दफन’ प्रक्रिया पर सवाल, अंतरराष्ट्रीय बाजार में अंगों की तस्करी का शक

फिरोज अहमद खान (पत्रकार)
बालोद। छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के किल्लोबाहरा जंगल में 24 फरवरी को मिले एक भालू के शव को बिना पोस्टमॉर्टम दफना दिया गया था। 27 दिन बाद, वन और पशु चिकित्सा विभाग की संयुक्त टीम ने शव को खोदकर निकाला। हैरानी की बात यह रही कि मात्र 1 फीट खुदाई के बाद ही भालू के चारों पंजे अलग-अलग गड़े मिले, जबकि 3 फीट नीचे से रस्सी से बांधकर सड़ा हुआ शरीर निकाला गया। शव इतना डी-कंपोज हो चुका था कि पहचान मुश्किल हो रही थी कि यह नर है या मादा भालू। आपको बता दें कि नर भालू के लिंग की अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत करोड़ों में है वही इसके नाखून और दांतों की भी आसपास कीमत है।
क्यों हुई देरी? गोपनीयता या लापरवाही? आपको बता दें कि बालोद वन विभाग के वनकर्मियों ने शव मिलने की सूचना उच्च अधिकारियों को नहीं दी और नियमों को दरकिनार करते हुए जल्दबाजी में दफन कर दिया। भालू के अंगों की अवैध तस्करी में वन अधिकारियों की संलिप्तता का अंदेशा लगाया जा रहा है। भालू की लाश को दफनाने वाला स्थान दल्ली राजहरा वन परिक्षेत्र की सीमा के नजदीक है, जहां पहले भी ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं। जिससे कई प्रकार के अनायास अनुमान लगाए जा रहे है।
भालू के पंजे, त्वचा और आंतरिक अंगों के नमूने नेशनल फॉरेंसिक लैब (दिल्ली, हैदराबाद) में भेजे गए। मौत का कारण (जहर, हथियार का निशान या प्राकृतिक)। पंजे अलग होने की क्या वजह रही होगी (जानवरों का हमला या मानवीय छेड़छाड़)। दफनाने से पहले पोस्टमॉर्टम न करने का क्या उद्देश्य रहा होगा। रिपोर्ट आने में 1 महीना लग सकता है।
यह केस भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है। वन विभाग को जवाब देना चाहिए। “भालू के पंजे की तस्करी होती है, शायद यही वजह रही होगी भालू के शव को दफन करने की।” वन मंडलाधिकारी ने बालोद रेंज के हर्राठेमा सर्किल के अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही का संकेत दिया है। वन विभाग ने मामले की हाई-लेवल जांच के आदेश दिए हैं। वहीं प्रदेश की कुछ वन्यजीव संरक्षण संस्थाएं मामले को राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) में उठाने की तैयारी में हैं। यह मामला वन्यजीव संरक्षण कानून, 1972 और पर्यावरण प्रबंधन की कमियों को उजागर करता है। जांच के नतीजे बताएंगे कि यह लापरवाही थी या सुनियोजित अपराध। फिलहाल, बालोद की जनता और वन्यजीव प्रेमी, बेसब्री के साथ सच्चाई का इंतजार कर रहे हैं।
वहीं वन विभाग के जिम्मेदार अधिकारी पत्रकारों के फोन नहीं उठाते। बालोद वन मंडलाधिकारी बलभद्र सरोटे को फोन किया गया तो उन्होंने फोन नही उठाया। वहीं भालू की लाश को निकालने में लगे डौंडीलोहारा वन परिक्षेत्र अधिकारी केके साहू भी कभी फोन नहीं उठाते।