रायपुर

मौत के सौदागर ! मुक्तांजलि एंबुलेंस में करोड़ों का खेल, शवों पर चल रही लूट की मंडी…

रायपुर। छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली किसी से छिपी नहीं, लेकिन अब जो खुलासा हुआ है, वह न केवल शर्मनाक, बल्कि अमानवीय भी है। गरीबों के लिए सरकार द्वारा चलाई जा रही मुफ्त शव एंबुलेंस सेवा ‘मुक्तांजलि’ (1099) को भ्रष्टाचारियों ने अपनी काली कमाई का अड्डा बना लिया है। फर्जी बिलिंग, मनगढ़ंत नाम, झूठे पते, और ग़लत किलोमीटर रीडिंग के जरिए हर साल सरकारी खजाने से करोड़ों रुपए की बंदरबांट की जा रही है।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस घोटाले में स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी और निजी एजेंसियां मिलकर सिंडीकेट की तरह काम कर रही हैं। फर्जीवाड़े के तहत ऐसे मृतकों के नाम पर बिल बना दिए जाते हैं, जिनका कोई अस्तित्व ही नहीं। कहीं मृत्यु से पहले ही शव घर पहुंचा दिया गया, तो कहीं ऐसे लोगों के नाम पर एंबुलेंस सेवा का बिल निकला, जिनके परिवार में किसी की मौत ही नहीं हुई।

पड़ताल में चौंकाने वाले खुलासे : शिकायतों के बाद जब इस योजना से जुड़े दस्तावेजों की गहन जांच की गई, तो घोटाले की परतें खुलने लगीं। कई मामलों में मृतकों और उनके परिजनों के नाम पूरी तरह फर्जी निकले।

➡ केस 1: मृतक का अस्तित्व ही नहीं! : सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज है कि प्रिया पाढ़ो (1 दिन का बच्चा) पिता सुनील पाढ़ो की मृत्यु हुई और शव उनके परिजनों को सौंपा गया। जब दस्तावेज में दर्ज मोबाइल नंबर पर कॉल किया गया, तो फोन उठाने वाले व्यक्ति ने बताया कि उसका नाम महेंद्र सिंह है और उसके परिवार में कोई मौत नहीं हुई।

➡ केस 2: मौत से पहले ही शव पहुंचाने का घोटाला :स्वास्थ्य विभाग के दस्तावेजों में दर्ज है कि कौशल्या बाई का शव 4 अप्रैल 2024 को एम्स से राजनांदगांव भेजा गया। लेकिन जब पड़ताल की गई, तो पता चला कि महिला की मृत्यु 11 अप्रैल को हुई थी, और शव भिलाई ले जाया गया था।

➡ केस 3: फर्जी परिजन, झूठी जानकारी :अंबिकापुर जिला अस्पताल से सविता गोंड के दो दिन के बच्चे का शव वाड्रफ नगर ले जाने का दावा किया गया। जब दिए गए मोबाइल नंबर पर संपर्क किया गया, तो फोन उठाने वाले व्यक्ति विजेंद्र ने स्पष्ट रूप से कहा, “मेरे यहां किसी की मृत्यु नहीं हुई!”

➡ केस 4: कब्र से पहले यात्रा :सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक मृतका समा बाई (84) का शव 4 अप्रैल 2024 को एम्स रायपुर से उसूर, बीजापुर भेजा गया। जब दस्तावेज में दर्ज परिजन से संपर्क किया गया, तो सामने आया कि उस नाम का व्यक्ति ही फर्जी था!

आंकड़े जो सिस्टम की पोल खोलते हैं :

💰 हर साल 18-20 करोड़ रुपए का बजट
💰 पिछले 5 वर्षों में 100 करोड़ से अधिक खर्च
💰 70% भुगतान बिना किसी जांच के किया जाता है
💰 हर साल 38 से 40 हजार शवों को पहुंचाने का दावा
💰 हर दिन 500 कॉल्स मुक्तांजलि सेवा के लिए दर्ज

सिस्टम में व्याप्त भ्रष्टाचार, अधिकारी जवाब देने से बचते रहे : जब स्वास्थ्य विभाग के नोडल अधिकारी डॉ. कमलेश जैन से इस घोटाले पर सवाल किया गया, तो उन्होंने साफ कहा, “मामले में मैं कुछ नहीं कह सकता, आप आला अधिकारियों से बात करें।” यह बयान साफ इशारा करता है कि भ्रष्टाचार का यह जाल सिर्फ निचले स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें बड़े अधिकारी भी शामिल हो सकते हैं।

स्वास्थ्य मंत्री का वादा—लेकिन क्या होगा कुछ? : स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जयसवाल ने इस मामले पर बयान दिया, “जांच कराएंगे, दोषियों पर कड़ी कार्रवाई होगी। किसी को नहीं छोड़ा जाएगा।”

गंभीर सवाल जो सरकार से पूछे जाने चाहिए :

क्या सरकार इस लूट में शामिल अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई करेगी?
क्या गरीबों के शवों पर चल रही यह लूट रोकी जाएगी?
क्या यह सिर्फ एक योजना तक सीमित घोटाला है, या पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था भ्रष्टाचार की जड़ों में जकड़ी हुई है?

यह केवल घोटाला नहीं, इंसानियत पर हमला है : जो लोग इस दुनिया से चले गए, उनके नाम पर भी भ्रष्टाचार किया जा रहा है—क्या इससे बड़ी बेशर्मी और कोई हो सकती है? गरीबों के लिए चलाई गई इस योजना का फायदा उठाने की बजाय, भ्रष्ट अधिकारी और एजेंसियां इस पर लूट मचा रही हैं। अब देखना यह होगा कि क्या सरकार इन गुनहगारों पर शिकंजा कसती है, या फिर सिस्टम इन्हें बचाने में जुट जाता है!

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